Thursday, September 24, 2026

उत्तम ब्रह्मचर्य : देह नहीं, देही को पहचानो

ललितपुर | शाबाश इंडिया।

दशलक्षण महापर्व (पर्युषण पर्व) के दसवें और अंतिम दिन, 25 सितंबर 2026 पर विशेष रूप से उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना की जाती है। यह केवल शारीरिक संयम का नाम नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म की पवित्रता के साथ अपनी दृष्टि को देह से हटाकर देही की ओर ले जाने की साधना है। जैन दर्शन में ब्रह्मचर्य को आत्मसंयम और आत्मोपलब्धि की यात्रा का महत्वपूर्ण आधार माना गया है।

‘ब्रह्म’ अर्थात आत्मा और ‘चर्या’ अर्थात उसमें रमण करना। इस दृष्टि से ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ अपने ज्ञानस्वरूप आत्मतत्त्व में विचरण करना है। जिसकी दृष्टि केवल शरीर तक सीमित रहती है, वह भोग की ओर आकर्षित होता है; लेकिन जब मनुष्य देह के पार स्थित चेतन सत्ता को पहचानने लगता है, तब उसके भीतर संयम और आत्मजागरण का प्रकाश प्रकट होता है।

देह-दृष्टि से देही-दृष्टि की ओर

मनुष्य की बड़ी भूल यह है कि वह स्वयं को केवल शरीर मान बैठता है। शरीर परिवर्तनशील और नश्वर है, जबकि उसके भीतर स्थित आत्मतत्त्व चेतना का आधार है। उत्तम ब्रह्मचर्य इसी भेद का बोध कराता है।

ब्रह्मचर्य का अर्थ इच्छाओं को जबरन दबाना नहीं, बल्कि अपनी दृष्टि और चेतना को ऊंचा उठाना है। जब मनुष्य अपनी ऊर्जा को क्षणिक भोगों से हटाकर स्वाध्याय, साधना, सेवा, सृजन और आत्मचिंतन की ओर मोड़ता है, तब ब्रह्मचर्य जीवन की शक्ति बन जाता है।

देह के आकर्षण में क्यों अपना स्वरूप भुलाएं,
भीतर के चैतन्य को पहचानें, आत्मदीप जलाएं।
भोगों की क्षणभंगुर छाया कब तक मन को भरमाए,
ब्रह्मचर्य वही, जो आत्मा तक हमें पहुंचाए।।

गृहस्थ के लिए भी उतना ही प्रासंगिक

ब्रह्मचर्य केवल मुनियों अथवा अविवाहितों की साधना नहीं है। गृहस्थ के लिए इसका अर्थ दांपत्य में निष्ठा, मर्यादा और संयम तथा जीवन के प्रत्येक संबंध में पवित्र दृष्टि रखना है। विवाह वासना की स्वच्छंदता का निमंत्रण नहीं, बल्कि इच्छाओं को मर्यादा में रखते हुए संबंधों को जिम्मेदारी, प्रेम और आत्मीयता से जीने की व्यवस्था है।

पति-पत्नी के प्रति निष्ठा रखते हुए अन्य स्त्री-पुरुषों के प्रति मां, बहन, बेटी, पिता, भाई अथवा पुत्र जैसी पवित्र दृष्टि विकसित करना ब्रह्मचर्य की व्यवहारिक साधना है। इस दृष्टि से ब्रह्मचर्य वासना से वात्सल्य और आकर्षण से आत्मीयता की ओर ले जाने वाला संस्कार है।

स्वतंत्रता नहीं, स्वच्छंदता से सावधान

आज स्वतंत्रता के नाम पर कई बार स्वच्छंदता को जीवन-मूल्य समझ लिया जाता है। बाजार, मनोरंजन और डिजिटल माध्यमों की निरंतर उत्तेजना मनुष्य की इंद्रियों को बाहर की ओर खींचती रहती है। ऐसे वातावरण में उत्तम ब्रह्मचर्य का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।

अश्लील अथवा कुत्सित साहित्य, अमर्यादित दृश्य-सामग्री, भोगवादी जीवन-दृष्टि और इंद्रिय-उत्तेजना को बढ़ाने वाली प्रवृत्तियों से सजग दूरी रखना आवश्यक है। आहार की शुद्धता, विचारों की निर्मलता, संगति की पवित्रता और दृष्टि का संयम ब्रह्मचर्य की आधारभूमि हैं।

मर्यादा जीवन का बंधन नहीं, उसकी सुरक्षा-रेखा है। जिस प्रकार नदी के दोनों तट उसके प्रवाह को दिशा देते हैं, उसी प्रकार जीवन को मर्यादाएं संतुलन प्रदान करती हैं। मर्यादा टूटती है तो व्यक्ति ही नहीं, परिवार और समाज भी उसके दुष्परिणामों से प्रभावित होते हैं।

समस्त साधनाओं का आधार

ब्रह्मचर्य के बिना अन्य व्रतों और साधनाओं की पूर्णता कठिन है। इंद्रियां विषयों की ओर दौड़ती रहें और मन वासनाओं में उलझा रहे तो आत्मचिंतन की गहराई प्राप्त करना कठिन हो जाता है। इसलिए ब्रह्मचर्य केवल एक आचरण नहीं, बल्कि आत्मविजय की आधारभूमि है।

दशलक्षण महापर्व के अंतिम दिन हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम केवल शरीर की पवित्रता की बात न करें, बल्कि मन की वासनाओं, दृष्टि की अशुद्धियों, विचारों की चंचलता और इंद्रियों की असंयमित प्रवृत्तियों पर विजय का प्रयास भी करें।

दशलक्षण के दस दिनों की साधना का उद्देश्य केवल दस धर्मों का स्मरण करना नहीं, बल्कि उन्हें जीवन में उतारना है। उत्तम क्षमा से आरंभ हुई यह आध्यात्मिक यात्रा जब उत्तम ब्रह्मचर्य तक पहुंचती है, तो संदेश देती है कि आत्मा की ओर जाने वाला मार्ग बाहर से भीतर की ओर जाता है।

अतः ब्रह्मचर्य का सार यही है—देह में रहो, लेकिन देह के मोह में मत खोओ; संबंध निभाओ, लेकिन आसक्ति में मत डूबो; संसार में रहो, लेकिन आत्मा को मत भूलो।

जब दृष्टि देह से हटकर देही पर टिकती है, तब भोग की जगह योग, वासना की जगह वात्सल्य और चंचलता की जगह आत्मशांति जन्म लेती है। यही उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की वास्तविक साधना है और यही दशलक्षण महापर्व की आध्यात्मिक पूर्णता भी।

लेखक: डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर
आध्यात्मिक चिंतक एवं जैनदर्शन के अध्येता

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