
मालेगांव | शाबाश इंडिया।
दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर जैन दर्शन के नवें एवं अत्यंत व्यावहारिक धर्म—उत्तम आकिंचन्य धर्म—पर चिंतन आवश्यक है। आकिंचन्य का सीधा और गहरा अर्थ है—इस पूरे ब्रह्मांड में ‘किंचन मात्र’, अर्थात रत्ती भर भी मेरा नहीं है। जब आत्मा बाहरी वस्तुओं और आंतरिक विकारों के प्रति ममत्व का त्याग करती है, तब उत्तम आकिंचन्य धर्म प्रकट होता है। यह केवल धन-दौलत या भौतिक वस्तुओं को छोड़ने का नाम नहीं, बल्कि ‘यह मेरा है’ की मानसिक जिद से मुक्त होने की साधना है।
आज के दौर में हमारी खुशियां अक्सर इस बात से जुड़ गई हैं कि हमारे पास क्या-क्या है—मकान, गाड़ी, बैंक बैलेंस, पद और प्रतिष्ठा। हम वस्तुओं के मालिक बनना चाहते हैं, लेकिन अनजाने में कई बार वही वस्तुएं हमारी चिंता और तनाव का कारण बन जाती हैं। आकिंचन्य धर्म हमें भीतर की ओर देखने की प्रेरणा देता है। सच्चा सुख बाहरी संग्रह में नहीं, बल्कि अपने स्वभाव और आत्मिक स्वरूप में लीन होने में है।
महाकवि द्यानतराय जी कृत दशलक्षण धर्म पूजा की पंक्तियां इस भाव को प्रभावी ढंग से सामने रखती हैं—
“परिग्रह चौबीस भेद, त्याग करैं मुनिराज जी।
तिसना भाव उछेद, घटती जान घटाइए॥
उत्तम आकिंचन गुण जानो, परिग्रह-चिंता दुःख ही मानो।
फांस तनक-सी तन में साले, चाह लंगोटी की दुःख भाले॥”
इन पंक्तियों में परिग्रह और तृष्णा के संबंध को समझाया गया है। जैन दर्शन में परिग्रह के 24 भेद बताए गए हैं, जिनमें आंतरिक विकारों और बाहरी वस्तुओं का वर्णन मिलता है। दिगंबर मुनिराज इनका पूर्ण त्याग करते हैं। गृहस्थ जीवन में रहते हुए हर व्यक्ति के लिए उसी स्तर का त्याग संभव हो, यह आवश्यक नहीं; लेकिन अपनी तृष्णा और इच्छाओं को सीमित करना अवश्य संभव है। अपनी सुख-सुविधाओं की सीमा तय करना और अनावश्यक संग्रह से बचना आकिंचन्य की साधना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
“उत्तम आकिंचन गुण जानो, परिग्रह-चिंता दुःख ही मानो”—इन पंक्तियों में आकिंचन्य को केवल बाहरी त्याग नहीं, बल्कि आत्मा के उत्तम गुण के रूप में देखने का संदेश है। वस्तुएं हमेशा उतना दुःख नहीं देतीं, जितना उन्हें संभालने, उनसे अधिक पाने और उनके खो जाने की चिंता मनुष्य को परेशान करती है। परिग्रह को सुख का स्थायी साधन न मानकर उससे उत्पन्न होने वाली चिंता को पहचानना ही इस धर्म की साधना का प्रारंभ है।
“फांस तनक-सी तन में साले, चाह लंगोटी की दुःख भाले”—कवि ने यहां एक अत्यंत सरल उदाहरण के माध्यम से गहरी बात कही है। जैसे पैर में चुभी छोटी-सी फांस तब तक चैन नहीं लेने देती, जब तक वह बाहर न निकल जाए, उसी प्रकार मन में किसी वस्तु के प्रति बची हुई छोटी-सी चाह भी व्यक्ति को भीतर से विचलित कर सकती है। कोई व्यक्ति बहुत कुछ छोड़ दे, लेकिन मन में किसी छोटी-सी वस्तु के प्रति भी मोह शेष रह जाए, तो वह मोह मुक्ति के मार्ग में बाधा बन सकता है।
आकिंचन्य हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि त्याग की महिमा वस्तु की कीमत से नहीं, बल्कि उसके प्रति हमारे मानसिक जुड़ाव से तय होती है। जब मनुष्य यह भाव विकसित करता है कि “मैं शुद्ध ज्ञान-दर्शन स्वरूप आत्मा हूं और बाहरी वस्तुएं मेरी स्थायी संपत्ति नहीं हैं”, तब ममत्व, असुरक्षा और अनावश्यक चिंता से दूरी बनाना संभव होता है।
उत्तम आकिंचन्य धर्म हमें वस्तुओं से भागने का नहीं, बल्कि उनके प्रति आसक्ति को समझने और सीमित करने का संदेश देता है। इच्छाओं पर संयम, संग्रह पर मर्यादा और आत्मस्वरूप की ओर बढ़ता चिंतन जीवन में शांति और संतुलन की दिशा खोल सकता है। आइए, दशलक्षण महापर्व में हम भी इस धर्म के मर्म को समझें और ‘मेरेपन’ के बंधन से मुक्त होकर अंतस की आज़ादी की ओर कदम बढ़ाएं।
लेखिका: डॉ. अल्पना जैन ‘महाराष्ट्र गौरव’
जिन धर्म रक्षिका एवं समाज सेविका, मालेगांव
🙏 उत्तम आकिंचन्य धर्म की जय 🙏


