
सोनकच्छ | शाबाश इंडिया।
पर्वों के पर्वराज दशलक्षण महापर्व के सातवें चरण उत्तम तप के अवसर पर पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ में धर्मसभा का आयोजन हुआ। पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर महाराज के सानिध्य में वर्षायोग के लिए विराजमान व्रत चक्रवर्ती पट्ट विभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पियूष सागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
उत्तम तप के महत्व पर प्रवचन करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि जीवन में कुछ करने का हौसला बुलंद होना चाहिए। उन्होंने प्रेरक भाव रखते हुए कहा कि अभी चलना शुरू किया है, उड़ना बाकी है; मुट्ठी भर जमीन नापी है, अभी आसमान नापना बाकी है।
आचार्य श्री ने कहा कि उत्तम तप का वास्तविक अर्थ केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन की उछलकूद को रोकना और इच्छाओं पर नियंत्रण करना है। संसार जितना दिखाई देता है, उससे कहीं बड़ा संसार मनुष्य के भीतर बसा हुआ है। बाहरी संसार सीमित है, लेकिन मन में बसी इच्छाओं का संसार अनंत है। मनुष्य जितना इच्छाओं के पीछे भागता है, उतना ही अशांत होता जाता है।
उन्होंने कहा कि आज मनुष्य बच्चों से ज्यादा अपनी इच्छाओं को पाल रहा है। इच्छाओं की पूर्ति के लिए वह दिन-रात भागदौड़ करता रहता है। अपनी क्षमता और सामर्थ्य से अधिक इच्छाएं नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अनियंत्रित इच्छाएं मनुष्य के लिए परेशानी का कारण बनती हैं। आशा जहां प्रेरणा देती है, वहीं अनियंत्रित अपेक्षाएं मनुष्य को भटका भी सकती हैं और निरंतर दौड़ाती भी हैं।
आचार्य श्री ने दो इंद्रियों पर नियंत्रण के महत्व को समझाते हुए कहा कि यदि मनुष्य चक्षु और रसना इंद्रिय पर संयम कर ले तो जीवन की अनेक परेशानियों से बच सकता है। आंखों से उत्पन्न आकर्षण और जीभ के स्वाद की लालसा मनुष्य को अनेक विकारों की ओर ले जा सकती है। इसलिए इंद्रियों पर संयम रखना तप का महत्वपूर्ण अंग है।
भोजन के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भूख से कुछ कम भोजन करना भी तप की भावना से जुड़ा है। आवश्यकता से अधिक भोजन शरीर और मन दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। भोजन को केवल स्वाद और भोग का साधन न मानकर शरीर के लिए आवश्यक आहार के रूप में ग्रहण करना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘जो लोग भोजन को दवा समझकर खाते हैं, वे दवाखाने जाने से बच सकते हैं, लेकिन जो भोजन को दबा-दबा कर खाते हैं, उन्हें दवाखाने जाना पड़ता है।’’ उन्होंने संयमित भोजन और सात्विक जीवनशैली को स्वस्थ एवं संतुलित जीवन के लिए उपयोगी बताया।
आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि तप मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है और आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ाता है। इच्छाओं, वासनाओं और मन की चंचलता पर नियंत्रण स्थापित करना ही तप की वास्तविक साधना है। मनुष्य को बाहरी उपलब्धियों के साथ अपने भीतर की इच्छाओं पर भी विजय प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। तप, त्याग, संयम और आत्मानुशासन से जीवन को शांति और सार्थकता की दिशा मिलती है।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर आचार्य श्री के प्रवचन का लाभ लिया तथा उत्तम तप धर्म की भावना को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।
‘‘जो तप-त्याग की भट्टी में तपते हैं,
दुनिया के बाजार में वही सिक्के चलते हैं।’’
उक्त जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पियुष कासलीवाल, औरंगाबाद ने दी।


