
मालेगांव | शाबाश इंडिया।
दसलक्षण महापर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म की आराधना की जाती है। ‘मार्दव’ का अर्थ है मृदुता, कोमलता और विनम्रता। यह धर्म मनुष्य को अहंकार और ‘मैं-मेरे’ के भाव से ऊपर उठाकर समता, मैत्री और आत्मिक शुद्धि की ओर ले जाने की प्रेरणा देता है।
जैन दर्शन में मार्दव धर्म को निजात्मा और स्व-स्वरूप से जुड़ा धर्म माना गया है। जहां चित्त में मृदुता, व्यवहार में नम्रता और सभी के प्रति विनम्रता का भाव होता है, वहीं धर्म के इस विशेष गुण की वास्तविक साधना संभव होती है। मन, वचन और काय से ही हमारे विचार एवं कार्य अभिव्यक्त होते हैं। इसलिए इन तीनों में वक्रता और दोषों को स्थान न देकर सरलता एवं सहजता को अपनाना मार्दव धर्म की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
दसलक्षण धर्म में उत्तम क्षमा के बाद मार्दव आत्मविकास यात्रा का दूसरा पड़ाव माना जाता है। क्रोध कषाय को कम कर क्षमा धारण करने के साथ मान कषाय को दूर करना भी आवश्यक है। मान अर्थात अहंकार मन को मलिन करता है, जबकि उत्तम मार्दव मनुष्य को विनम्रता का मार्ग दिखाता है। अपने अस्तित्व का अनावश्यक प्रदर्शन न करना और दूसरों को सहज रूप से स्वीकार करना मार्दव धर्म की भावना है।
आचार्य समन्तभद्र रचित ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार’ में मान के आठ आधार बताए गए हैं—ज्ञान, पूजा, कुल, जाति, बल, ऋद्धि, तप और शरीर। इन उपलब्धियों को लेकर अहंकार न करने की प्रेरणा जैन आगम और गुरुजनों की शिक्षाओं में दी गई है। संसार में कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है। मनुष्य इस संसार में कुछ लेकर नहीं आता और न ही यहां से कुछ साथ लेकर जाता है। उसके साथ उसके कर्म ही जाते हैं, जबकि गुण, ज्ञान और संस्कार उसके जीवन की वास्तविक पूंजी बनते हैं।
उत्तम मार्दव हमें यह समझाता है कि जीवन में जो कुछ प्राप्त हुआ है, उसमें अनेक व्यक्तियों, परिस्थितियों और समाज का योगदान होता है। इसलिए सच्चा ज्ञानी वही है जो ज्ञान बढ़ने के साथ और अधिक सरल एवं विनम्र बने। अहंकार समाप्त होने पर मन में प्रेम, करुणा और आत्मिक आनंद के लिए स्थान बनता है।
जीवन से कब, कहां और कैसे विदा होना है, यह कोई नहीं जानता। लेकिन जीवन और मृत्यु के बीच मिले समय का सदुपयोग हमारे हाथ में है। आत्मचिंतन, सेवाभाव और सद्कार्यों में इस समय को लगाकर जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है। इसके विपरीत छल, कपट, माया, क्रोध, लोभ और अभिमान के वशीभूत होकर जीवन बिताना आत्मविकास में बाधक बनता है। इसलिए विवेकपूर्वक सहज और सरल रहते हुए मन की बुराइयों को दूर करना तथा अपने स्वभाव के सहज गुणों को पहचानना आवश्यक है।
विनम्रता मनुष्य को यह सिखाती है कि महानता का आधार अहंकार नहीं, बल्कि सरलता है। फल और हरियाली से लदा वृक्ष जिस प्रकार झुकता है, उसी प्रकार गुणों से संपन्न व्यक्ति भी विनम्र होता है। जो व्यक्ति सभी के प्रति विनय का भाव रखता है, वह दूसरों के हृदय में सहज सम्मान और स्थान प्राप्त करता है।
दसलक्षण महापर्व का यह दिन हमें ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर बढ़ने, मान को त्यागने और विनय को जीवन का स्वभाव बनाने की प्रेरणा देता है। उत्तम मार्दव की साधना का सार यही है कि अहंकार मिटे, मन में विनय का दीप जले और प्रत्येक जीव के प्रति आत्मीयता एवं समता का भाव विकसित हो।
जाप मंत्र: ॐ ह्रीं श्रीं उत्तममार्दवधर्माङ्गाय नमः।


