
भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया।
श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने कहा कि मनुष्य अक्सर बाहरी परिस्थितियों, परिवार, वस्तुओं या लोगों को अपने बंधन का कारण मानता है, जबकि सबसे मजबूत बेड़ियां भीतर होती हैं। लोहे की जंजीर टूट सकती है, लेकिन राग की पकड़ न छूटे तो सामर्थ्य होते हुए भी मनुष्य स्वयं को मुक्त नहीं कर पाता। द्वेष भी किसी व्यक्ति से दूरी नहीं बनाता, बल्कि उसे मन में और गहराई से बैठा देता है। उन्होंने ये विचार शांतिभवन आनन्द अनुभूति वर्षावास में आयोजित विशाल धर्मसभा में ‘राग-द्वेष के बंधन और आत्मशक्ति’ विषय पर व्यक्त किए।
युवाचार्यश्री ने एक ताकतवर मल्ल का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि उसके शरीर में इतनी शक्ति थी कि वह लोहे की हथकड़ी और पैरों की बेड़ियां एक झटके में तोड़ सकता था, फिर भी वर्षों तक जेल में बंद रहा। राजा ने उससे पूछा कि जब इतनी शक्ति थी तो भागे क्यों नहीं? मल्ल ने उत्तर दिया कि यदि वह निकल जाता तो उसके परिवार को कष्ट दिया जाता। युवाचार्यश्री ने कहा कि उसे जेल की दीवारें नहीं, बल्कि परिवार के प्रति राग रोक रहा था। यही स्थिति हमारी भी है—शक्ति भीतर है, लेकिन भीतर की पकड़ उससे बड़ी हो जाती है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को पद, धन, प्रतिष्ठा या सामर्थ्य मिलते ही सबसे बड़ा खतरा बाहर से नहीं, भीतर से पैदा होता है। वह अपनी शक्ति को साधन बनाने के बजाय स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगाने लगता है। अहंकार ताकत नहीं, बल्कि ताकत पर लगा ग्रहण है। पूर्णिमा का चंद्रमा कितना ही उज्ज्वल क्यों न हो, ग्रहण उसकी चमक को ढक देता है; इसी प्रकार अहंकार गुणों की चमक को ढक देता है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि समस्या यह भी है कि अहंकारी व्यक्ति अपने अहंकार को पहचान नहीं पाता। वह उसे स्वाभिमान, जिद को सिद्धांत और अपनी बात मनवाने को दृढ़ता मान लेता है। जहां अपनी भूल की संभावना ही समाप्त हो जाए, वहां सुधार का रास्ता भी बंद हो जाता है।
उन्होंने कहा कि राग का स्वभाव अत्यंत सूक्ष्म है। वह जाता कम है, केवल अपना स्थान बदलता रहता है। बचपन में मां, फिर मित्र, आगे जीवनसाथी, संतान, कारोबार, करियर, पद और प्रतिष्ठा—व्यक्ति एवं वस्तुएं बदलती रहती हैं, लेकिन भीतर की पकड़ बनी रहती है। राग का पता बदल जाना वैराग्य नहीं है।
उन्होंने समझाया कि एक कंधे से बोझ हटाकर दूसरे कंधे पर रख देने से कुछ समय राहत मिल सकती है, लेकिन वजन खत्म नहीं होता। इसी प्रकार एक व्यक्ति से मोह हटाकर दूसरे व्यक्ति में या एक वस्तु से हटकर दूसरी में उलझ जाना मुक्ति नहीं है। बंधन व्यक्ति या वस्तु में कम और हमारे भीतर की पकड़ में अधिक होता है।
गौतम स्वामी का उदाहरण देते हुए युवाचार्यश्री ने कहा कि प्रभु महावीर के प्रति उनका अनुराग था, लेकिन वह केवल महावीर के व्यक्तित्व के प्रति नहीं, बल्कि उनकी सर्वज्ञता, वीतरागता और गुणों के प्रति था। यही अंतर बंधनकारी राग और साधना को ऊंचा उठाने वाले अनुराग में है। व्यक्ति से राग बांधता है, जबकि गुणों से अनुराग ऊपर उठाता है।
उन्होंने कहा कि संत के प्रति आकर्षण भी यदि केवल उनके व्यक्तित्व, बोलने की शैली या प्रभाव तक सीमित रह जाए तो साधना वहीं रुक सकती है। प्रवचन सुनकर केवल वक्ता अच्छा लगे तो यह आकर्षण है, लेकिन प्रवचन सुनकर अपनी कमी दिखाई दे और जीवन बदलने लगे तो सानिध्य सार्थक है। संत को पकड़ना नहीं, उनके गुणों को ग्रहण करना ही साधना है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि राग का चेहरा केवल रिश्तों में ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों में भी दिखाई देता है। भोजन अच्छा दिखा तो ले लिया, दूसरा पसंद आया तो वह भी ले लिया और अंत में थाली में छोड़ दिया—जरूरत से नहीं, आकर्षण से लिया गया भोजन भी राग का ही रूप है। शरीर को जितना चाहिए उतना लेना विवेक है, जबकि स्वाद के पीछे बहते जाना राग है।
उन्होंने कहा कि मोबाइल, धन, वस्त्र या किसी भी साधन का उपयोग गलत नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब साधन हमारी पहचान बनने लगे। वस्तु हमारी जरूरत पूरी करे तो ठीक है, लेकिन यदि वही हमारी खुशी और प्रतिष्ठा तय करने लगे तो समझना चाहिए कि पकड़ बढ़ चुकी है। साधन पर अधिकार रहे तो सुविधा है, लेकिन साधन मन पर अधिकार कर ले तो वह बंधन बन जाता है।
राग के बाद युवाचार्यश्री ने द्वेष को और गहरी गांठ बताया। मनुष्य सोचता है कि जिससे द्वेष कर लिया, उससे संबंध समाप्त हो गया, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। किसी व्यक्ति ने चार बार अच्छा कहा हो तो शायद याद न रहे, लेकिन उसके द्वारा कही गई एक कटु बात वर्षों तक मन में घूमती रहती है। द्वेष किसी को मन से निकालता नहीं, बल्कि उसे और मजबूती से भीतर बैठा देता है।
उन्होंने द्वेष की तुलना जमी हुई चिकनाहट से करते हुए कहा कि सामान्य घी की चिकनाहट जल्दी उतर जाती है, लेकिन वनस्पति घी की परत बार-बार साफ करनी पड़ती है। द्वेष भी ऐसा ही है। सामने वाले का कितना नुकसान होगा, यह निश्चित नहीं, लेकिन द्वेष पालने वाले की शांति जरूर चली जाती है।
उन्होंने कहा कि द्वेष की गांठ भव-भव तक पीछा कर सकती है। पार्श्वकुमार ने वैर नहीं पकड़ा, इसलिए आगे बढ़ गए; कमठ वैर को पकड़े रहा, इसलिए बंधता चला गया। वैर सामने वाले को कितनी देर जलाएगा, यह पता नहीं, लेकिन जिस मन में रखा जाता है, उसे सबसे पहले वही जलाता है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि किसी ने गलत किया हो तो उसे सही मानना जरूरी नहीं है, लेकिन उसकी गलती को जीवनभर अपने भीतर ढोना भी समझदारी नहीं है। कटुता घटेगी तो कषाय की परत पतली होगी और भीतर दबा सामर्थ्य बाहर आने लगेगा। क्षमा सामने वाले पर एहसान नहीं, बल्कि अपने मन से बोझ उतारने की साधना है।
उन्होंने कहा कि पर्वाधिराज पर्युषण का वास्तविक उद्देश्य केवल परंपरा निभाना नहीं है। तप, त्याग, सामायिक, प्रवचन और आराधना हमें अपने भीतर लौटने का अवसर देते हैं। इन दिनों यह देखना चाहिए कि व्यक्ति और वस्तुओं के प्रति हमारी पकड़ कितनी ढीली हुई, द्वेष की कितनी गांठें खुलीं और हम अपने वास्तविक स्वरूप के कितने निकट आए।
युवाचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि संबंध छोड़ देना साधना नहीं है और जिम्मेदारियों से भाग जाना वैराग्य नहीं। कपड़े का बटन व्यवस्था है, बंधन नहीं; लेकिन वही व्यवस्था सांस रोकने लगे तो उसे खोलना पड़ता है। इसी प्रकार परिवार, समाज, धन और व्यवहार जीवन की व्यवस्था हैं, लेकिन उनमें अटक जाना बंधन है।
उन्होंने कहा कि पर्युषण संसार से भागने का नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए अपनी पकड़ को पहचानने का पर्व है। राग व्यक्ति से हटकर गुणों में बदले, द्वेष क्षमा में गलने लगे और अहंकार के पीछे छिपी आत्मशक्ति प्रकट होने लगे, तभी आराधना भीतर तक पहुंचती है। व्यक्ति और वस्तु बदलते रहने से बंधन नहीं टूटते; बंधन तब टूटते हैं जब भीतर की पकड़ ढीली पड़ती है। गुणों से अनुराग और राग-द्वेष से विराम ही आत्मा को उसके वास्तविक सामर्थ्य की ओर लौटाता है। संबंध रहें, लेकिन आत्मा उनमें कैद न हो—यही साधना की असली दिशा है।
साध्वी काव्याश्रीजी ने कहा कि जब तक व्यक्ति अपने मन से साक्षात्कार नहीं करता, तब तक जीवन में वास्तविक शांति की अनुभूति संभव नहीं है।
शांतिभवन आनन्द अनुभूति वर्षावास में तप-आराधना का क्रम निरंतर जारी है। संरक्षक नवरतनमल बंब एवं अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद चीपड़ ने बताया कि दो, तीन, चार एवं पांच उपवास की तपस्या कर रहे भाई-बहनों ने युवाचार्यश्री से प्रत्याख्यान ग्रहण किए। वहीं सिद्धितप की आराधना में 170 से अधिक तपस्वी निरंतर साधनारत हैं।
उन्होंने बताया कि युवाचार्यश्री एवं साध्वीवृंद के सान्निध्य में 4 सितंबर को जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष प्रवचन के साथ श्रीकृष्ण के विविध स्वरूपों में सजे बच्चों की आकर्षक वेशभूषा प्रस्तुति होगी। 5 सितंबर को मेवाड़ केसरी पूज्य मोहनलालजी महाराज का पुण्य स्मृति दिवस एकासन, सामायिक एवं गुणगान के साथ श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा।
त्रिदिवसीय महिला शिविर के दूसरे दिन शहर के विभिन्न महिला मंडलों की उल्लेखनीय सहभागिता रही। युवाचार्यश्री एवं साध्वी चिंतनश्रीजी ने अलग-अलग सत्रों में प्रतिक्रमण, आवश्यक सूत्र, जीवन-साधना और आत्म-विकास से जुड़े विषयों पर मार्गदर्शन दिया। शांति जैन महिला मंडल के आयोजन में अध्यक्षा सिम्मी पोखरणा, प्रमिला सूरिया, बसंता डांगी, इन्द्रा बाफना, सरिता पोखरणा, स्नेहलता चौधरी, हेमलता खेराडा, नीतू चोरड़िया, प्रेरणा लोढ़ा, चेतना चपलोत, प्रीति गुगलिया एवं प्रमिला कोचिटा सहित मंडल की बहनों ने सहयोग दिया। मंडल की ओर से शिविर में सहभागी सभी महिला मंडलों एवं बहनों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।
प्रवक्ता : सुनील चपलोत
मो.: 9413730514
शांतिभवन, भोपालगंज, भीलवाड़ा


