Wednesday, August 26, 2026

श्रमण संस्कृति में श्रमणत्व रक्षा का महापर्व है रक्षा बंधन

जयपुर | शाबाश इंडिया।

श्रावण शुक्ल पूर्णिमा का दिन सामान्य रूप से रक्षा बंधन के नाम से जाना जाता है, लेकिन श्रमण संस्कृति में यह केवल कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने का पर्व नहीं, बल्कि धर्म, साधना और श्रमणत्व की रक्षा का संकल्प दिवस है। जैन परंपरा में इस दिन 700 मुनिराजों की घोर उपसर्ग से रक्षा की स्मृति में वात्सल्य एवं रक्षा बंधन पर्व मनाया जाता है।

जैन परंपरा के अनुसार उज्जयिनी के राजा श्रीधर्म के चार मंत्री—बलि, बृहस्पति, नमुचि और प्रह्लाद—शास्त्रार्थ में पराजित होने के बाद श्रुतसागर मुनिराज पर प्रहार करने का प्रयास करने लगे। राजा ने उन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया। अपमानित होकर चारों हस्तिनापुर के राजा पद्म की शरण में पहुंच गए।

इसी बीच आचार्य अकंपन मुनिराज 700 मुनि शिष्यों के संघ सहित हस्तिनापुर पहुंचे। मुनिराजों की साधना और आत्मबल देखकर बलि के मन में पुराना अपमान जाग उठा और उसने उनसे प्रतिशोध लेने का निश्चय किया।

बलि ने राजा पद्म से सात दिनों के लिए राज्य प्राप्त कर लिया। सत्ता मिलते ही उसने आचार्य अकंपन सहित 700 मुनिराजों के साधना स्थल के चारों ओर अग्नि प्रज्वलित करवा दी। धुआं, ताप और दुर्गंध से मुनिराजों को अत्यंत कष्ट होने लगा। उनका आहार-विहार तक बाधित हो गया, लेकिन मुनियों ने बाहरी कष्टों के सामने अपनी आंतरिक शांति और समता को नहीं छोड़ा।

मुनिराजों ने आत्मसाधना में लीन रहते हुए संकल्प किया कि जब तक उपसर्ग समाप्त नहीं होगा, तब तक वे अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। यह संकट श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन चरम पर था।

मुनिराजों पर आए इस भीषण संकट की जानकारी विष्णुकुमार मुनिराज को हुई। उन्होंने अपनी विक्रिया ऋद्धि का प्रयोग करते हुए वामन का रूप धारण किया और राजा बलि के पास पहुंचे। उन्होंने भिक्षा में तीन पग भूमि मांगी।

बलि द्वारा दान की स्वीकृति मिलते ही विष्णुकुमार मुनिराज ने अपना विराट रूप धारण किया। एक पग सुमेरु पर्वत पर और दूसरा मानुषोत्तर पर्वत पर रखा। तीसरे पग के लिए स्थान शेष न रहने पर बलि को अपनी भूल का बोध हुआ और उसने क्षमा याचना की।

इस प्रकार विष्णुकुमार मुनिराज ने 700 मुनिराजों को घोर उपसर्ग से मुक्त कराया। मुनिराजों की साधना, समता और धर्म के प्रति अडिग निष्ठा की यह घटना आज भी श्रमण संस्कृति के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

मुनिराजों की रक्षा की इस पावन स्मृति में रक्षा बंधन को जैन समाज में वात्सल्य पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। यह पर्व हमें केवल एक-दूसरे की रक्षा का नहीं, बल्कि धर्म, साधना, संतों और श्रमण संस्कृति के संरक्षण का संकल्प देता है।

इस दिन मंदिरों में सात सौ मुनिराजों की पूजन, विधान एवं अर्घ्य समर्पण किया जाता है। देव-शास्त्र-गुरु के समक्ष रक्षा सूत्र बांधकर धर्म एवं संस्कृति की रक्षा का संकल्प लिया जाता है। मुनि विष्णुकुमार की आराधना के साथ उपसर्ग विजेता 700 मुनिराजों को श्रद्धापूर्वक नमन किया जाता है।

श्रावण शुक्ल पूर्णिमा का यह दिन जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ के निर्वाण दिवस के रूप में भी श्रद्धा और भक्ति से मनाया जाता है। अतः यह पर्व धर्मरक्षा, संतवात्सल्य, आत्मसाधना और निर्वाण-भक्ति का संदेश देता है।

जयपुर के जनकपुरी स्थित श्री दिगम्बर जैन मंदिर में आचार्य श्री 108 आदित्य सागर जी ससंघ के सान्निध्य में तीन दिवसीय श्रमणत्व रक्षा महामहोत्सव का आयोजन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त मीरा मार्ग, वरुण पथ, साधु सेवा तीर्थ पदमपुरा, मंगल विहार, चित्रकूट, मुरलीपुरा, कमला नेहरू नगर, भट्टारक जी की नसियां सहित अनेक स्थानों पर रक्षा बंधन एवं वात्सल्य पर्व के धार्मिक आयोजन होंगे।

मंदिरों में मुनि विष्णुकुमार की पूजन के पश्चात उपसर्ग-विजेता 700 मुनिराजों को अर्घ्य समर्पित कर नमन किया जाएगा। देव-शास्त्र-गुरु के समक्ष रक्षा सूत्र बांधने के साथ धर्मरक्षा का संकल्प लिया जाएगा। अनेक जिनालयों में भक्ति संध्या, विधान एवं अन्य धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित होंगे।

पार्श्वनाथ मंदिर सोनियांन, चूलगिरी, जग्गा की बावड़ी, सांवलाजी आमेर सहित विभिन्न जैन मंदिरों में भी रक्षा बंधन पर्व पर विशेष धार्मिक आयोजन होंगे।

रक्षा बंधन का संदेश स्पष्ट है—रक्षा केवल शरीर की नहीं, संस्कारों की हो; रक्षा केवल व्यक्ति की नहीं, धर्म की हो; और बंधन केवल सूत्र का नहीं, परस्पर वात्सल्य एवं श्रमणत्व रक्षा के संकल्प का हो।

— पदम जैन बिलाला
जनकपुरी, जयपुर

- Advertisement -spot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article

Skip to toolbar