जयपुर | शाबाश इंडिया।

डॉ. विजय गर्ग
एक समय था जब गांवों, कस्बों और शहरों की सुबह गौरैयों और अन्य पक्षियों की चहचहाहट से होती थी। बगीचों, आंगनों और खेतों में तितलियां फूलों के बीच मंडराती दिखाई देती थीं। आज अनेक स्थानों पर ये परिचित जीव पहले की तुलना में कम नजर आते हैं। यह केवल प्राकृतिक सुंदरता के कम होने का विषय नहीं है, बल्कि हमारे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे बदलावों का संकेत भी हो सकता है।
गौरैया, पक्षी और तितलियां पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनके अस्तित्व के लिए उपयुक्त आवास, भोजन, पानी, पेड़-पौधे और सुरक्षित वातावरण आवश्यक हैं। इनके घटने के पीछे अनेक कारण हैं, जिनमें अधिकांश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मानवीय गतिविधियों से जुड़े हैं।
सबसे प्रमुख कारणों में प्राकृतिक आवास का नष्ट होना है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण पेड़ों, खुले स्थानों, बगीचों, झाड़ियों, तालाबों और प्राकृतिक वनस्पतियों की जगह इमारतों, सड़कों और कंक्रीट ने ले ली है। गौरैया पहले घरों की छतों, दीवारों, बालकनियों और छोटी-छोटी जगहों में आसानी से घोंसले बना लेती थीं। आधुनिक इमारतों में ऐसी जगहें कम होती जा रही हैं। इसी प्रकार तितलियों को भोजन, अंडे देने और अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिए विशेष पौधों की आवश्यकता होती है। प्राकृतिक वनस्पतियों के कम होने से उनके भोजन और प्रजनन स्थल भी घट रहे हैं।
एक अन्य महत्वपूर्ण कारण कीटों की संख्या में कमी है। कई पक्षी कीटों पर निर्भर रहते हैं, विशेषकर अपने बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने के समय। तितलियां और अन्य परागणकर्ता फूलदार पौधों पर निर्भर होते हैं। कृषि और बागवानी में रसायनों तथा कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से कीटों की संख्या प्रभावित हो सकती है और पूरी खाद्य श्रृंखला पर इसका असर पड़ता है।
स्थानीय पौधों की कमी भी चिंता का विषय है। स्थानीय पेड़, झाड़ियां, घास और फूलदार पौधे लंबे समय से स्थानीय जीव-जंतुओं के साथ विकसित हुए हैं। वे पक्षियों और तितलियों को भोजन तथा आश्रय प्रदान करते हैं। विविध प्राकृतिक वनस्पतियों की जगह केवल सजावटी पौधे लगाने से बगीचा सुंदर तो दिखाई दे सकता है, लेकिन जैव विविधता के लिए आवश्यक संसाधन कम हो सकते हैं। इसलिए स्थानीय फूलदार पौधों और पेड़ों को बढ़ावा देना आवश्यक है।
आधुनिक शहरी निर्माण भी पक्षियों और अन्य जीवों के लिए चुनौती बन रहा है। पुराने घरों में आंगन, छतों की खाली जगह, छोटे छेद और आसपास पेड़-पौधे होते थे, जो गौरैयों के लिए उपयोगी थे। आधुनिक निर्माण में कांच, कंक्रीट और बंद सतहों का अधिक उपयोग होने से घोंसले बनाने की जगह कम हो गई है। सड़कों और बस्तियों के विस्तार से प्राकृतिक आवास छोटे-छोटे हिस्सों में बंटते जा रहे हैं।
प्रदूषण भी एक गंभीर समस्या है। वायु प्रदूषण जीव-जंतुओं के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। प्रदूषित पानी जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और उससे जुड़ी खाद्य श्रृंखलाओं को नुकसान पहुंचाता है। प्लास्टिक कचरा प्राकृतिक आवास को खराब करता है और जीवों के लिए खतरा पैदा करता है। यातायात, निर्माण और मशीनों का अत्यधिक शोर पक्षियों के संचार को प्रभावित कर सकता है। रात में अत्यधिक कृत्रिम रोशनी भी कीटों और अन्य जीवों के प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित करती है।
जलवायु परिवर्तन भी एक बढ़ती चुनौती है। तापमान, वर्षा और मौसम के समय में बदलाव से फूलों के खिलने, कीटों की उपलब्धता और पक्षियों के प्रजनन पर प्रभाव पड़ सकता है। यदि पौधे पहले फूलने लगें या कीटों की उपलब्धता का समय बदल जाए तो भोजन की उपलब्धता और पक्षियों की आवश्यकताओं के बीच असंतुलन पैदा हो सकता है। अत्यधिक गर्मी, सूखा, बाढ़ और मौसम की अन्य चरम घटनाएं भी वन्यजीवों पर अतिरिक्त दबाव डालती हैं।
इन जीवों का कम होना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाते हैं। पक्षी कीटों की संख्या नियंत्रित करने, बीजों को फैलाने और खाद्य श्रृंखला के संतुलन में योगदान देते हैं। तितलियां और अन्य परागणकर्ता पौधों के परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे कई अन्य जीवों के लिए भोजन का स्रोत भी हैं। इसलिए जैव विविधता में कमी का प्रभाव केवल किसी एक प्रजाति तक सीमित नहीं रहता।
इनकी रक्षा के लिए हमेशा बड़े संरक्षण प्रोजेक्ट की आवश्यकता नहीं होती। व्यक्ति और समुदाय मिलकर छोटे-छोटे प्रयासों से भी महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते हैं। घरों और बगीचों में स्थानीय पेड़ तथा फूलदार पौधे लगाए जा सकते हैं। अनावश्यक कीटनाशकों के प्रयोग से बचना चाहिए। गर्मी के मौसम में पक्षियों के लिए स्वच्छ पानी रखा जा सकता है और पानी के बर्तनों की नियमित सफाई की जानी चाहिए।
स्कूल, पार्क और सामुदायिक स्थान छोटे जैव विविधता उद्यान विकसित कर सकते हैं। स्थानीय प्रशासन पुराने पेड़ों की रक्षा, तालाबों का संरक्षण और हरित क्षेत्रों का विस्तार कर सकता है। किसान पर्यावरण के अनुकूल कीट प्रबंधन के तरीकों को अपनाकर जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें प्रकृति से अपना संबंध फिर मजबूत करना होगा। बच्चों को पक्षियों, तितलियों, पेड़-पौधों और कीटों का निरीक्षण करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। प्रकृति के प्रति जागरूकता बचपन से विकसित होने पर संरक्षण की भावना भी मजबूत होती है।
गौरैया, पक्षियों और तितलियों का कम होना केवल बीते समय की याद नहीं है। यह संकेत हो सकता है कि हमारे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ रहा है। स्वस्थ पर्यावरण के लिए पेड़, पौधे, कीट, पानी, आश्रय और जैव विविधता आवश्यक हैं।
यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां भी पक्षियों की चहचहाहट सुनें और अपने आसपास तितलियों को उड़ते देखें, तो संरक्षण का प्रयास आज से ही शुरू करना होगा। जैव विविधता की रक्षा केवल जंगलों और वन्यजीव अभयारण्यों में नहीं होती; इसकी शुरुआत हमारे घरों, बगीचों, स्कूलों, गांवों, गलियों और शहरों से होती है। छोटे जीवों की रक्षा करना वास्तव में उस प्राकृतिक संतुलन की रक्षा करना है, जिस पर हमारा अपना भविष्य भी निर्भर करता है।
डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्रिंसिपल, शिक्षाविद् एवं विज्ञान लेखक
Academic Editor, Online Magazine FnBWorld.com
मलोट, पंजाब


