Wednesday, August 19, 2026

साधना के 22 वर्ष पूर्ण होने पर विशेष : तपस्या की प्रतिमूर्ति, आत्मध्यान के सागर एवं काय-क्लेश के जीवंत साधक हैं जयपुर गौरव मुनि विशाल सागर महाराज

जयपुर | शाबाश इंडिया।

साधना, तप, त्याग, संयम और आत्मध्यान की कठिन साधना के 22 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर जयपुर गौरव स्थविर मुनि श्री विशाल सागर जी महाराज का साधनामय जीवन जैन समाज के लिए प्रेरणा का विषय है। 22 अगस्त को उनकी साधना यात्रा के 22 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। वर्तमान में मुनिश्री श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर, चित्रकूट कॉलोनी, सांगानेर में अपने दीक्षा गुरु परम पूज्य आचार्य श्री 108 विशद सागर जी महाराज के ससंघ चातुर्मास में साधना की नई ऊंचाइयों को स्पर्श कर रहे हैं।

मुनिश्री का जीवन केवल त्याग और तपस्या की कथा नहीं, बल्कि आत्मा की ओर निरंतर लौटते हुए एक साधक की जीवंत आध्यात्मिक यात्रा है। वर्तमान में वे 72 दिन की उनोदर तप साधना कर रहे हैं, जिसका अन्न आहार पारणा 1 अक्टूबर 2026 को होगा।

प्रारंभिक जीवन और संस्कार

मुनि श्री विशाल सागर जी महाराज का जन्म 10 जून 1973 को जयपुर में सांगा का रास्ता स्थित सांगा भवन में श्रीमती पदमा देवी की पावन कोख से हुआ। उनके पिता श्री माणकचंद जैन पांड्या धार्मिक प्रवृत्ति एवं संस्कारवान व्यक्ति थे।

पांच संतानों—सुनील, अनिल, सुधीर, सुनीता एवं अनिता—में तीसरे क्रम के सुधीर जैन आगे चलकर जैन समाज के गौरव तपस्वी संत मुनि श्री विशाल सागर जी महाराज के रूप में विख्यात हुए।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा बाल शिक्षा मंदिर, महावीर पार्क स्कूल, श्री दिगंबर जैन महावीर स्कूल एवं अग्रवाल स्कूल, जयपुर में हुई। इसके बाद उन्होंने गुप्ता कॉलेज एवं जयपुर कॉलेज में अध्ययन किया।

वैराग्य की ओर बढ़े कदम

सन् 1998 में फाइनेंस एवं चिटफंड कंपनियों में हुई धोखाधड़ी के कारण उन्हें आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ा। संसार की अस्थिरता और भौतिक उपलब्धियों की क्षणभंगुरता का यह अनुभव उनके जीवन में वैराग्य की दिशा में महत्वपूर्ण मोड़ बना।

सन् 1999 में दशलक्षण पर्व के अवसर पर अलवर के जैन भवन में आयोजित श्रावक संस्कार शिविर में वे शामिल हुए। मुनि श्री सुधासागर जी महाराज के पावन आशीर्वाद से उन्होंने पहली बार दशलक्षण पर्व में दस उपवास किए। श्री महावीरजी में महावीर जयंती के अवसर पर आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज से ब्रह्मचर्य व्रत का नियम धारण किया।

इसके बाद सिद्धार्थ नगर, जयपुर स्थित श्री महावीर जिनालय में नियमित अभिषेक-पूजन एवं नगर में पधारने वाले साधु-संतों की सेवा में सक्रिय रहने लगे।

मोक्षमार्ग की प्रथम सीढ़ी

22 अगस्त 2004 को जौहरी बाजार, जयपुर में वर्षायोग कर रहे मुनि श्री विशद सागर जी महाराज से उन्होंने सप्तम प्रतिमा के नियम अंगीकार किए। यह उनके सांसारिक जीवन से आध्यात्मिक जीवन की ओर निर्णायक प्रस्थान था।

13 फरवरी 2005 को मालपुरा की पावन धरा पर आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज के आशीर्वाद से मुनि श्री विशद सागर जी महाराज आचार्य पद से संस्कारित हुए। इसी अवसर पर उन्होंने जयपुर के सुधीर जैन को मुनि दीक्षा प्रदान कर ‘मुनि श्री विशाल सागर जी’ नाम दिया।

उनका प्रथम चातुर्मास निवाई में हुआ और यहीं से उनकी कठोर, अनुशासित एवं साधनामय मुनि जीवन की यात्रा प्रारंभ हुई।

सम्मेद शिखरजी में विलक्षण साधना

परम पूज्य आचार्य श्री विशद सागर जी महाराज के आशीर्वाद से मुनिश्री ने सम्मेद शिखरजी पर्वत की 25 टोंकों के प्रत्येक कूट की लगातार 1008-1008 वंदना की।

3 मई 2022 से 8 मार्च 2023 तक उन्होंने सम्मेद शिखरजी पर्वत की 306 बार चरण-वंदना की। यह साधना उनके अटूट आत्मबल, श्रद्धा और गुरु आज्ञा के प्रति पूर्ण समर्पण को दर्शाती है।

अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागर जी महाराज की 496 उपवास एवं 61 पारणों की विलक्षण साधना के दौरान मुनि श्री विशाल सागर जी महाराज स्वर्णभद्र कूट पर होने वाले प्रत्येक पारणे के साक्षी रहे। एक अवसर पर पारणा देखने से वंचित न रह जाएं, इसके लिए मुनिश्री ने बीसपंथी कोठी विमल छतरी से स्वर्णभद्र कूट तक की कठिन चढ़ाई मात्र 75 मिनट में पूरी की।

सम्मेद शिखरजी के लगभग दस माह के प्रवास में उन्होंने 108 व्रत-उपवास के माध्यम से अपनी साधना को और प्रखर बनाया। मुनिश्री ने सम्मेद शिखरजी पर्वत की पांच बार पद-परिक्रमा भी की।

साधना के दौरान विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने क्षमा, शांति और सहनशीलता का परिचय दिया।

साधना का अद्भुत अंकगणित

मुनि श्री विशाल सागर जी महाराज की साधना के आंकड़े स्वयं में प्रेरणादायी हैं। उन्होंने 24 अवसरों पर कुल 635 घंटे लगातार पद्मासन अथवा सुखासन में बैठकर तप-साधना की। इनमें एक अवसर पर अधिकतम 120 घंटे तक निरंतर साधना का उल्लेख मिलता है।

इसी प्रकार 23 अवसरों पर कुल 826 घंटे लगातार खड़गासन में साधना की। इनमें एक अवसर पर अधिकतम 157 घंटे तक गौतम गणधर टोंक पर खड़गासन में रहकर साधना की।

साधना काल में उन्होंने लगभग 5353 दिन, अर्थात साढ़े चौदह वर्ष से अधिक अवधि के व्रत-उपवास किए हैं। इनमें 16 बार सोलहकरण व्रत तथा 51 बार अष्टाह्निका व्रत भी शामिल हैं।

ये आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि त्याग, तप, आत्मसंयम और आत्मकल्याण की दिशा में उठाए गए असंख्य कदमों की कहानी हैं।

गुरुचरणों में 22 वर्षों की साधना

मुनि श्री विशाल सागर जी महाराज पिछले 22 वर्षों से अधिक समय से अपने दीक्षा गुरु परम पूज्य आचार्य श्री विशद सागर जी महाराज की छत्रछाया में साधनारत हैं।

गुरु सान्निध्य में उन्होंने 80 से अधिक पंचकल्याणक एवं वेदी प्रतिष्ठा महोत्सवों का अनुभव प्राप्त किया है। साथ ही गुरुवर द्वारा रचित साहित्य के संकलन एवं संपादन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

जयपुर में जारी कठोर साधना

जयपुर प्रवास के बाद मुनिश्री द्वारा अष्टाह्निका व्रत, नौ दिन की साधना, अखंड 35, 12 एवं 13 घंटे तक लगातार नमोकार महामंत्र उच्चारण जाप्य साधना, पदमपुरा मंदिर की मात्र दस घंटे में 1008 बाह्य परिक्रमा तथा 5, 13 एवं 40 घंटे तक लगातार पद्मासन साधना उल्लेखनीय रही है।

वर्तमान में 21 जुलाई 2026 से 72 दिन की उनोदर तप साधना चल रही है, जो 1 अक्टूबर 2026 को अन्न आहार पारणा के साथ पूर्ण होगी।

साधना का संदेश

मुनि श्री विशाल सागर जी महाराज का साधनामय जीवन यह संदेश देता है कि साधना केवल बाहरी तपस्या नहीं, बल्कि कषायों को क्षीण करने, मन को निर्मल करने, आत्मा में स्थिर होने और परिग्रह से विरक्त होने की निरंतर प्रक्रिया है।

जयपुर जैसे धर्मनगरी के लिए यह गौरव का विषय है कि यहां ऐसे तपस्वी मुनिराज का चातुर्मास हो रहा है, जिनका जीवन स्वयं संयम का संदेश, तपस्या का प्रमाण और आत्मकल्याण की प्रेरणा बन चुका है।

साधना के 22 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर ऐसे तपोनिष्ठ, आत्मध्यानरत, संयममूर्ति, काय-क्लेश के जीवंत साधक एवं स्थविर मुनि अलंकरण से सम्मानित जयपुर गौरव मुनि श्री विशाल सागर जी महाराज के चरणों में शत-शत नमन।

पदम जैन बिलाला
जनकपुरी, जयपुर

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