
भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया।
“मुखिया मुख सो चाहिए, खान-पान को एक, पालै पोसै सकल अंग, तुलसी सहित विवेक”—इस भाव को केंद्र में रखते हुए श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने कहा कि सच्चा मुखिया वह है, जो स्वयं के लिए नहीं बल्कि पूरे संघ के लिए जीता है। जो प्रत्येक सदस्य की चिंता करे, सबको साथ लेकर चले और अपने आचरण से संगठन को ऊर्जा प्रदान करे। यह विचार उन्होंने मंगलवार को शांतिभवन में आनंद जन्मोत्सव के तहत आयोजित विशाल धर्मसभा में आचार्य आनंद ऋषिजी महाराज के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए व्यक्त किए।
युवाचार्यश्री ने कहा कि बालक नेमीचंद से आचार्य आनंद ऋषिजी बनने तक की यात्रा केवल पद परिवर्तन की यात्रा नहीं थी, बल्कि बढ़ती जिम्मेदारियों के बीच साधना, ज्ञान और सेवा को जीवन का आधार बनाए रखने की यात्रा थी। गुरु रत्न ऋषिजी के देवलोकगमन के बाद उन्होंने अपने छोटे गुरु भाई उत्तम ऋषिजी के साथ साधना और जिनशासन की सेवा को आगे बढ़ाया। बाद में धार्मिक परीक्षा बोर्ड की स्थापना से लेकर सिद्धांतशालाओं और पाठशालाओं के विस्तार तक उन्होंने ज्ञान एवं संस्कार को समाज की स्थायी शक्ति बनाने का प्रयास किया।
पद नहीं, जिम्मेदारी को माना दायित्व
युवाचार्यश्री ने कहा कि आनंद ऋषिजी ने पद प्राप्त होने के बाद स्वयं को कभी बड़ा नहीं माना। “जिस डाल पर फल अधिक होते हैं, वही अधिक झुकती है”—यह भाव उनके जीवन में स्पष्ट दिखाई देता था। युवाचार्य पद, आचार्य पद और संघ की विभिन्न जिम्मेदारियों के निर्वहन के बावजूद उनकी सहजता, विनम्रता और संयम में कोई अंतर नहीं आया। उनके लिए पद अधिकार का माध्यम नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का दायित्व था।
उन्होंने कहा कि आचार्यश्री का ज्ञान जितना गंभीर था, उनका संयम उतना ही सजीव और व्यवहार में दिखाई देता था। चलने, उठने-बैठने, आहार लेने, वस्तुओं को रखने और दैनिक आचरण तक में वे समितियों एवं संयम की सूक्ष्मता का पालन करते थे। वे केवल संयम का उपदेश देने वाले संत नहीं, बल्कि संयम को अपने जीवन में साकार करने वाले महापुरुष थे।
हर संत-साध्वी की चिंता रखते थे
युवाचार्यश्री ने कहा कि “मुखिया मुख सो चाहिए” का वास्तविक अर्थ आचार्य आनंद ऋषिजी के व्यवहार में दिखाई देता था। वे संघ के प्रत्येक संत-साध्वी की साता, आवश्यकता और स्वास्थ्य की जानकारी रखते थे। गोचरी के समय संतों की उपस्थिति का ध्यान रखना हो या किसी साधु की दवा और उपचार की चिंता—उनकी दृष्टि कभी किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती थी।
किसी संत को पीछे या दूर देखकर उसकी ओर ध्यान देना और आवश्यकता समझकर पास बुला लेना उनकी सूक्ष्म संवेदनशीलता का उदाहरण था। उनका वात्सल्य केवल अपने संघ तक सीमित नहीं था। अन्य परंपराओं के साधु-साध्वियों के प्रति भी उनके मन में कटुता के बजाय धर्मभाव था।
उन्होंने बताया कि प्रतापगढ़ में अन्य संप्रदाय के साधु-साध्वियों का चातुर्मास कराने की बात आई तो आचार्यश्री ने धर्माराधना को प्राथमिकता देते हुए उनके प्रति भी सम्मान और आवश्यक सुविधाओं का ध्यान रखने की प्रेरणा दी। यही व्यापक दृष्टि एक मुखिया को केवल संगठन का प्रमुख नहीं, बल्कि पूरे धर्मसमाज का संरक्षक बनाती है।
दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचाया धर्म का संदेश
युवाचार्यश्री ने कहा कि आचार्यश्री का नेतृत्व केवल स्थायी स्थानों तक सीमित नहीं था। उन्होंने उत्तर भारत के दूरस्थ गांवों तक विहार किया और उन क्षेत्रों में भी पहुंचे, जहां वर्षों से साधु-संतों का प्रवास नहीं हुआ था। उनका उद्देश्य केवल अपनी गुरु-परंपरा का प्रभाव बढ़ाना नहीं, बल्कि लोगों को धर्म से जोड़ना था।
उन्होंने कहा कि सबको सींचना, सबकी सारणा-वारणा करना और प्रत्येक व्यक्ति को धर्म से जोड़ना ही आचार्य आनंद ऋषिजी के नेतृत्व की पहचान थी।
नई पीढ़ी को संस्कारित करना था प्राथमिकता
पाठशालाओं के संदर्भ में युवाचार्यश्री ने कहा कि आनंद ऋषिजी की दूरदृष्टि आज भी मार्गदर्शक है। उनका मानना था कि समाज का वास्तविक भविष्य नई पीढ़ी के संस्कारों में है। इसलिए धार्मिक पाठशालाओं के संचालन में समाज को केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि समय, श्रम, ज्ञान और प्रोत्साहन के रूप में भी सहभागी बनना चाहिए।
उन्होंने जन्मजयंती के अवसर पर प्रत्येक क्षेत्र में संचालित धार्मिक पाठशालाओं के लिए यथासंभव सहयोग करने का संकल्प लेने का आह्वान किया।
युवाचार्यश्री ने कहा कि आनंद ऋषिजी की जीवन-यात्रा बताती है कि मुखिया वह नहीं जो सबसे आगे दिखाई दे, बल्कि वह है जिसकी दृष्टि सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक पहुंचे। जो स्वयं संयमित रहे, सबकी चिंता करे, ज्ञान को संस्कार में बदले और पूरे संघ को धर्म की दिशा में आगे बढ़ाए—ऐसा नेतृत्व ही लंबे समय तक प्रभाव छोड़ता है।
साध्वी चिंतनश्रीजी ने भी आचार्यश्री की ज्ञान-साधना, तप और सरल जीवन का स्मरण करते हुए उनके व्यक्तित्व को प्रेरणास्रोत बताया।
साध्वी सोम्याश्रीजी ने 20 और साध्वी नाव्याश्रीजी ने 9 उपवास के प्रत्याख्यान लिए
शांतिभवन आनंद अनुभूति वर्षावास मंत्री नवरतनमल भलावत ने बताया कि तपस्या क्रम में मासखमण की ओर अग्रसर साध्वी सोम्याश्रीजी ने 20 उपवास तथा साध्वी नाव्याश्रीजी ने 9 उपवास की तपस्या के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। बड़ी संख्या में तपस्वी भाई-बहनों ने भी तेले सहित विभिन्न तप आराधनाओं के युवाचार्यश्री से प्रत्याख्यान ग्रहण किए।
उन्होंने बताया कि आचार्य आनंद ऋषिजी महाराज की 126वीं जन्मजयंती 13 अगस्त को शांतिभवन में 1008 आयंबिल तप दिवस के रूप में मनाई जाएगी। इस अवसर पर युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी, यशोदिप्ती मधुकंवरजी, उपप्रवर्तिनी दिव्यज्योतिजी, महासती सुचेताजी, साध्वी प्रियुदर्शनाजी सहित साध्वीवृंद का सान्निध्य रहेगा।
जन्मजयंती पर होने वाली सामूहिक तप आराधना आचार्यश्री की संयम-साधना को समर्पित होगी। 1008 आयंबिल तप के लाभार्थी नवरतनमल बंब परिवार हैं।
प्रवक्ता: सुनील चपलोत
शांतिभवन, भोपालगंज, भीलवाड़ा


