Wednesday, August 5, 2026

अवसर रहते आत्मपुरुषार्थ से चूकना जीवन का सबसे बड़ा पश्चाताप : युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी

भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया।

शांतिभवन में चातुर्मासार्थ आयोजित विशाल धर्मसभा में श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने कहा कि जीवन की सबसे बड़ी भूल अवसर का अभाव नहीं, बल्कि अवसर रहते उसकी पहचान न कर पाना है। अनुकूल परिस्थितियां, सामर्थ्य और साधना का अवसर मिलने के बाद भी यदि व्यक्ति आत्मकल्याण की दिशा में पुरुषार्थ नहीं करता, तो अंततः उसके हाथ केवल पश्चाताप ही रह जाता है।

युवाचार्यश्री ने एक प्राचीन कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि एक निर्धन ब्राह्मण को चक्रवर्ती से जीवनभर के भोजन की व्यवस्था का अवसर मिला, लेकिन वह श्रेष्ठ भोजन के बाद भी नए स्वाद की तलाश में अवसर खो बैठा। जब तक उसे अपनी भूल का अहसास हुआ, तब तक अवसर समाप्त हो चुका था। उन्होंने कहा कि जीवन में प्राप्त अनुकूलता का मूल्य समय रहते समझना ही विवेक है।

आगमिक संदर्भ देते हुए युवाचार्यश्री ने कहा कि देवता भी तीन कारणों से परिताप करते हैं—श्रुत का पर्याप्त अध्ययन न कर पाना, संयम-साधना को गंभीरता से न जीना तथा विषयासक्ति में आत्मकल्याण का समय गंवा देना। उन्होंने कहा कि आत्मा की उन्नति बाहरी ऐश्वर्य से नहीं, बल्कि जागृत पुरुषार्थ से होती है।

उन्होंने कहा कि श्रुत का उद्देश्य केवल विद्वत्ता अर्जित करना नहीं, बल्कि परमात्मा के वचनों को समझकर श्रद्धा को दृढ़ करना और राग-द्वेष को क्षीण करना है। यदि ज्ञान जीवन और आचरण में परिवर्तन नहीं ला सके, तो उसकी सार्थकता अधूरी रह जाती है।

युवाचार्यश्री ने कहा कि आत्मा की यात्रा अनेक जन्मों तक चलती है। ऐसे में यश, प्रतिष्ठा और अहंकार में जीवन व्यतीत करना आत्मकल्याण के मार्ग से भटकना है। वैराग्य का उद्देश्य आत्मा का परिष्कार और कर्मबंधन से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ना है।

विषयासक्ति पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य क्षणिक सुखों के मोह में जीवन का अमूल्य समय नष्ट कर देता है। जब तक विषयों की तृष्णा समाप्त नहीं होगी, तब तक साधना के लिए आवश्यक जागृति संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों से भागना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मबल के साथ सहने की शक्ति देता है। आत्महत्या या मृत्यु कर्मों से मुक्ति का मार्ग नहीं, बल्कि आत्मपुरुषार्थ और कर्मक्षय ही वास्तविक समाधान है।

युवाचार्यश्री ने कहा कि मानव जन्म पुनः मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए वर्तमान में उपलब्ध अवसर को भविष्य के भरोसे छोड़ देना सबसे बड़ा प्रमाद है। जीवन की सार्थकता समय रहते जागने, साधना करने और आत्मपुरुषार्थ में प्रवृत्त होने में ही है।

इस अवसर पर महासती सुचेताजी ने कहा कि आत्मचिंतन के बिना जीवन में वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं है। धर्म की शरण ही मनुष्य को कठिन परिस्थितियों से उबरने की दिशा प्रदान करती है।

आनन्द अनुभूति चातुर्मास संयोजक कंवरलाल सूरिया एवं मदनलाल चोरड़िया ने बताया कि चातुर्मास में तपस्या का क्रम निरंतर जारी है। अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने 3, 4, 5 एवं 6 उपवास सहित विभिन्न तपस्याओं का संकल्प लिया है। 4 अगस्त से युवाचार्यश्री एवं साध्वीवृंद के सान्निध्य में आनन्द सिद्धितप आराधना प्रारंभ होगी, जिसमें 160 से अधिक श्रावक-श्राविकाओं ने सामूहिक रूप से तप के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। वहीं 5 अगस्त से आचार्य आनन्द ऋषिजी की जन्मजयंती के उपलक्ष्य में नौ दिवसीय धार्मिक आयोजनों की श्रृंखला प्रारंभ होगी, जिसके अंतर्गत 13 अगस्त को 1008 आयंबिल तप की आराधना भी आयोजित की जाएगी।

सभा का संचालन शांतिभवन मंत्री नवरतनमल भलावत ने किया।

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