
भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया।
अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगद्गुरु आचार्य स्वामी श्री रामदयालजी महाराज ने कहा कि यदि परमात्मा को पाना है तो करोड़ों कार्य छोड़कर सबसे पहले भजन करना चाहिए। शास्त्रों में भी यही संदेश दिया गया है कि भजन जीवन का प्रथम कर्तव्य होना चाहिए, लेकिन आज अधिकांश लोग भजन छोड़कर सांसारिक कार्यों में व्यस्त हो गए हैं। उन्होंने कहा कि भजन के लिए समय नहीं, बल्कि सही समझ और श्रद्धा की आवश्यकता होती है।
माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में आयोजित ‘विश्व शांति कल्याण’ चातुर्मास के अंतर्गत दैनिक सत्संग में आचार्य श्री ने कहा कि मानव शरीर परमात्मा की कृपा से, संस्कार कुल की कृपा से और सत्संग एवं भजन सद्गुरु की कृपा से प्राप्त होते हैं। राम-नाम के स्मरण से जन्म-मरण के बंधनों से मुक्ति मिलती है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार भोजन आवश्यक है, उसी प्रकार भजन भी जीवन का अनिवार्य अंग होना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि जीवन में सुख और दुःख दोनों स्थायी नहीं हैं। इसलिए सुख में अहंकार नहीं करना चाहिए और दुःख में घबराना नहीं चाहिए। मनुष्य जीवन एक सीढ़ी के समान है, जिसमें भजन, सेवा और सद्कर्म के माध्यम से देवत्व की ओर बढ़ा जा सकता है, जबकि राग, द्वेष, ईर्ष्या और अज्ञान मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं।
उन्होंने कहा कि मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है, लेकिन उसके फल भोगने में परतंत्र है। यदि व्यक्ति नाम और धन प्राप्त करने में लगने वाली बुद्धि को भगवान की भक्ति में लगाए, तो लोक और परलोक दोनों सुधर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि संसार में सलाह देने वालों की कमी नहीं है, लेकिन सबसे अधिक आवश्यकता अपने मन को समझाने और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने की है।
इस अवसर पर रामस्नेही सम्प्रदाय के वरिष्ठ संत नरपत रामजी (उदयपुर) ने भी धर्मोपदेश दिया। प्रवचन के उपरांत प्रतापगढ़ के शर्मा परिवार ने आचार्य श्री की आरती की तथा गीता मालानी ने भजन प्रस्तुत किया। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन प्रातः 8:30 से 9:00 बजे तक वाणीजी का पाठ तथा 9:00 से 10:00 बजे तक सत्संग आयोजित किया जा रहा है। सूर्यास्त के समय संध्या आरती में भी श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में सहभागिता रही, जिसमें आरती का लाभ नीमच के मित्तल परिवार ने प्राप्त किया।


