ब्यावरा। शाबाश इंडिया

राष्ट्रसंत, तीर्थ चक्रवर्ती निर्यापक मुनि पुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ससंघ का ब्यावरा में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। इंदौर चातुर्मास की संभावनाओं के बीच बड़ी संख्या में श्रद्धालु उनके दर्शन एवं आशीर्वाद के लिए पहुंचे। इस अवसर पर शुभोदय तीर्थ पर विशाल पाषाण जिनालय एवं धर्मशाला निर्माण का भी शिलान्यास किया गया।
विशाल धर्मशाला के शिलान्यास समारोह को संबोधित करते हुए मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि चंपावती की पावन भूमि से प्रकट हुई अतिशयकारी देव प्रतिमाएं वर्षों तक अपने प्राकट्य के उचित समय की प्रतीक्षा करती रहीं। अब समय आ गया है कि उनके अतिशय का लाभ समस्त समाज को मिले। उन्होंने कहा, “किसी भक्त का पुण्य जोर मार रहा है, तभी यह भाव आया कि शुभोदय में त्रिकाल चौबीसी का निर्माण हो।”
उन्होंने कहा कि जितने अधिक श्रद्धालु इन प्रतिमाओं का अभिषेक करेंगे, उतना ही उनके अतिशय का लाभ समाज को प्राप्त होगा। उन्होंने शुभोदय तीर्थ को भविष्य का एक महान आध्यात्मिक केंद्र बताते हुए कहा कि यह तीर्थ आने वाले समय में देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बनेगा।
मध्यप्रदेश महासभा संयोजक विजय धुर्रा ने कहा कि मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज की प्रेरणा से प्रदेश सहित देशभर में अनेक प्राचीन जैन तीर्थों का संरक्षण, जीर्णोद्धार और नए तीर्थों का निर्माण हुआ है। उन्होंने कहा कि शुभोदय तीर्थ का विकास भी गुरुदेव की प्रेरणा का ही परिणाम है। उन्होंने बताया कि मुनि पुंगव ससंघ शुभोदय तीर्थ, बीनागंज से मंगल विहार करते हुए ब्यावरा पहुंचे हैं।
इस अवसर पर सकल जैन समाज इंदौर के प्रतिनिधि मंडल ने मुनि पुंगव श्री से इंदौर चातुर्मास का निवेदन भी किया। कार्यक्रम में मनीष गौधा द्वारा धर्मशाला निर्माण तथा अल्केश गांधी द्वारा विशाल पाषाण जिनालय निर्माण का पुण्यार्जन किया गया। तीर्थ कमेटी के अंकित जैन, मनोज जैन, अजय जैन, अशोक जैन, डॉ. विमल जैन सहित अन्य पदाधिकारियों ने उनका सम्मान किया।
जिज्ञासा समाधान कार्यक्रम में मुनि पुंगव श्री ने कहा कि किसी भी भूमि का महत्व उसके आकार से नहीं, बल्कि उसकी उपयोगिता और पवित्र उद्देश्य से होता है। जिस भूमि पर धर्म, साधना और संस्कारों का केंद्र बनता है, वही भूमि तीर्थ का स्वरूप धारण कर लेती है।
आध्यात्मिक प्रवचन में उन्होंने आत्मा के स्वरूप का विस्तार से विवेचन करते हुए कहा कि आत्मा का वास्तविक लक्षण ‘ज्ञाता-दृष्टा’ होना है। उन्होंने जैन दर्शन के प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यंताभाव और अन्योन्याभाव जैसे दार्शनिक सिद्धांतों को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाते हुए कहा कि आत्मा के सही स्वरूप का बोध ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।


