
जयपुर | शाबाश इंडिया।
मम दीक्षा-शिक्षाचार्य, सारस्वत कवि, विरागकुल गौरव, डॉ. परम पूज्य विभव सागर जी गुरुदेव के 50वें जन्म जयंती महोत्सव पर विशेष अभिनंदन आलेख
कुछ व्यक्तित्व केवल अपना जीवन नहीं जीते, बल्कि अपने विचारों, साधना, साहित्य और सृजन के माध्यम से समाज में नई चेतना का संचार करते हैं। कुछ जन्मदिवस केवल आयु के एक पड़ाव का उत्सव नहीं होते, बल्कि धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा के लिए विशेष अवसर बन जाते हैं। परम पूज्य विभव सागर जी गुरुदेव का 50वाँ जन्म जयंती महोत्सव ऐसा ही एक मंगलमय अवसर है।
कार्तिक कृष्ण अमावस्या भारतीय संस्कृति और जैन धर्म की दृष्टि से अत्यंत पावन तिथि है। इसी दिन जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण कल्याणक श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। जैन परंपरा के अनुसार, भगवान महावीर के निर्वाण के पश्चात इसी समय उनके प्रथम गणधर गौतम स्वामी को केवलज्ञान प्राप्त हुआ।
एक ओर भगवान महावीर का निर्वाण आत्ममुक्ति और मोक्षमार्ग का संदेश देता है, तो दूसरी ओर गौतम स्वामी का केवलज्ञान गुरु-भक्ति, साधना और आत्मपुरुषार्थ की प्रेरणा देता है। वहीं प्रभु श्रीराम का अयोध्या आगमन धर्म, मर्यादा और प्रकाश के पुनरागमन का प्रतीक है। ऐसी पावन तिथि पर गुरुदेव का जन्मदिवस होना अपने आप में एक सुंदर आध्यात्मिक संयोग है।
पचास वर्ष: आयु का पड़ाव नहीं, कृतित्व का स्वर्णिम अध्याय
जीवन के पचास वर्ष केवल समय की गणना नहीं, बल्कि अनुभव, चिंतन, साधना, सृजन और समाज को दिए गए योगदान के मूल्यांकन का अवसर होते हैं। परम पूज्य विभव सागर जी गुरुदेव के जीवन का यह स्वर्णिम पड़ाव उनके आध्यात्मिक एवं साहित्यिक कृतित्व के अभिनंदन का अवसर है।
गुरुदेव की लेखनी ने भक्ति को स्वर दिया, चिंतन को अभिव्यक्ति प्रदान की और साहित्य के माध्यम से जीवन के विविध आयामों को समाज के सामने प्रस्तुत किया। सौ से अधिक कृतियों का सृजन उनके दीर्घकालीन अध्ययन, मनन, चिंतन और सृजनशीलता की प्रेरक साधना यात्रा का परिचायक है।
‘तेरी छत्रच्छाया समाधि भक्ति’: लाखों कंठों का श्रद्धामय स्वर
गुरुदेव की साहित्यिक यात्रा में ‘तेरी छत्रच्छाया समाधि भक्ति’ का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह केवल एक रचना नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था और भावनाओं से जुड़ा लोकप्रिय स्वर बन चुकी है। असंख्य भक्तों ने इस समाधि भक्ति को अपने कंठ का हार बनाया है।
जब किसी रचनाकार के शब्द जन-जन के कंठ से प्रस्फुटित होने लगते हैं, तब वह रचना पुस्तक के पन्नों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जनमानस की भावनाओं की अमूल्य धरोहर बन जाती है।
भक्ति का वास्तविक स्वरूप केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि हृदय की निर्मलता, आत्मसमर्पण और अंतर्मन की एकाग्रता है। समाधि आत्मचिंतन और आत्मस्वरूप की अनुभूति की दिशा में अग्रसर होने वाली साधना है। इस रचना को भक्तों के बीच मिला विशेष स्थान गुरुदेव की भावपूर्ण लेखनी और आध्यात्मिक अनुभूति का परिचायक है।
सचमुच—
जिस रचना को लाखों कंठों ने अपना स्वर बनाया हो,
वह केवल साहित्य नहीं रहती,
वह जन-जन की श्रद्धा और भक्ति का अमर गीत बन जाती है।
‘पर्यावरण महाकाव्य’: प्रकृति संरक्षण का साहित्यिक शंखनाद
गुरुदेव के साहित्यिक कृतित्व का एक महत्वपूर्ण आयाम ‘पर्यावरण महाकाव्य’ की रचना है। आज पूरा विश्व पर्यावरण प्रदूषण, जल संकट, प्रकृति के असंतुलन और जैव विविधता के संरक्षण जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में पर्यावरण जैसे व्यापक विषय पर महाकाव्य की रचना विशेष महत्व रखती है।
प्रकृति केवल पेड़-पौधों, नदियों, पर्वतों और वायु का समुच्चय नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत के अस्तित्व का आधार है। जैन दर्शन में प्रत्येक जीव के प्रति करुणा, अहिंसा और सह-अस्तित्व की भावना को विशेष महत्व दिया गया है। इस दृष्टि से पर्यावरण संरक्षण केवल प्रकृति की रक्षा नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत के प्रति हमारी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का प्रतीक है।
गुरुदेव का ‘पर्यावरण महाकाव्य’ साहित्य के माध्यम से प्रकृति के प्रति जागरूकता, संरक्षण और संतुलित जीवनशैली की प्रेरणा देने वाली महत्वपूर्ण उपलब्धि है। एक ओर उनकी समाधि भक्ति लाखों कंठों में श्रद्धा का स्वर बनकर गूँज रही है, तो दूसरी ओर पर्यावरण महाकाव्य प्रकृति के प्रति मानवीय दायित्व का संदेश दे रहा है।
यह उनकी लेखनी के व्यापक स्वरूप को दर्शाता है। उनकी साहित्य साधना केवल भक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन, समाज, प्रकृति और आध्यात्मिक चेतना के विविध आयामों को स्पर्श करती है।
सौ से अधिक कृतियाँ: साहित्य साधना की अमूल्य धरोहर
परम पूज्य विभव सागर जी गुरुदेव द्वारा सौ से अधिक कृतियों का सृजन उनकी साहित्यिक यात्रा का गौरवपूर्ण अध्याय है। लेखन केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि अपने चिंतन, अनुभूति और अनुभवों को समाज तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम होता है।
सौ से अधिक कृतियों का सृजन वर्षों के अध्ययन, मनन, चिंतन और साहित्य के प्रति अगाध समर्पण का परिचायक है। गुरुदेव की रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए अध्ययन, विचार और प्रेरणा का आधार बन सकती हैं। साहित्य की यही विशेषता है कि रचनाकार के विचार और शब्द समय की सीमाओं से परे अनेक पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं।
व्यक्ति की आयु पचास वर्ष हो सकती है, किंतु उसके साहित्य की आयु अनेक पीढ़ियों तक चलती है।
कार्तिक अमावस्या: निर्वाण, केवलज्ञान और प्रकाश का अद्भुत संगम
कार्तिक कृष्ण अमावस्या का आध्यात्मिक महत्व इस जन्म महोत्सव को और भी विशिष्ट बनाता है। भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण हमें आत्मशुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति का संदेश देता है। गौतम स्वामी का केवलज्ञान सच्ची श्रद्धा, समर्पण और आत्मपुरुषार्थ की प्रेरणा देता है। प्रभु श्रीराम का अयोध्या आगमन मर्यादा, धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने का संदेश देता है।
इसी पावन तिथि पर गुरुदेव का जन्मोत्सव साहित्य, भक्ति और आध्यात्मिक चिंतन के अभिनंदन का अवसर बन जाता है। यह संयोग हमें स्मरण कराता है कि जीवन का वास्तविक सौंदर्य केवल उत्सव मनाने में नहीं, बल्कि धर्म, ज्ञान और सदाचार को अपने आचरण में आत्मसात करने में है।
50वाँ जन्म महोत्सव: श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता का महापर्व
गुरुदेव का 50वाँ जन्म महोत्सव केवल जन्मदिवस का आयोजन नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व, कृतित्व और साहित्यिक योगदान के प्रति सामूहिक कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है।
यह अवसर हमें प्रेरित करता है कि हम गुरुदेव की साहित्यिक कृतियों का अध्ययन करें, उनकी समाधि भक्ति को आत्मिक भाव से ग्रहण करें, पर्यावरण संरक्षण के संदेश को अपने जीवन में अपनाएँ और धर्म तथा सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ें।
गुरुदेव के प्रति सच्चा सम्मान तभी सार्थक होगा, जब उनके विचार हमारे व्यवहार में दिखाई देंगे और उनकी साहित्य साधना का प्रकाश आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचेगा।
मेरी मंगलभावना एवं विनयांजलि
आज इस पावन अवसर पर मैं, आर्यिका अर्हंश्री माताजी, अपने दीक्षा गुरु परम पूज्य विभव सागर जी गुरुदेव के 50वें जन्म महोत्सव पर अपनी विनयांजलि एवं मंगलभावनाएँ समर्पित करती हूँ।
गुरुदेव की लेखनी निरंतर आध्यात्मिक चेतना का प्रकाश प्रसारित करती रहे। उनकी समाधि भक्ति लाखों कंठों में श्रद्धा के स्वर के रूप में गूँजती रहे। उनका पर्यावरण महाकाव्य समाज को प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक करता रहे और उनकी सौ से अधिक कृतियों का साहित्यिक वैभव आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत बना रहे।
उनका जीवन और कृतित्व धर्म, ज्ञान, साहित्य, पर्यावरण चेतना एवं आत्मकल्याण की दिशा में निरंतर प्रेरणा प्रदान करता रहे—यही मेरी मंगलकामना है।
कार्तिक कृष्ण अमावस्या की इस पावन बेला में भगवान महावीर के निर्वाण कल्याणक, गौतम स्वामी के केवलज्ञान और प्रभु श्रीराम के अयोध्या आगमन की मंगल प्रेरणाओं के साथ गुरुदेव के स्वर्णिम पचास वर्षों को शत-शत नमन।
अंतिम भावांजलि: साधना, सृजन और साहित्य को शत-शत नमन
पचास वर्षों की यह यात्रा केवल आयु की यात्रा नहीं, बल्कि साधना, चिंतन और सृजन की प्रेरक कहानी है।
लाखों कंठों में गूँजती समाधि भक्ति, प्रकृति की चेतना जगाता पर्यावरण महाकाव्य और सौ से अधिक कृतियों का अनुपम साहित्यिक संसार—ये गुरुदेव के कृतित्व के स्वर्णिम आयाम हैं।
जन्म का यह उत्सव केवल आयु का अभिनंदन नहीं, बल्कि साहित्य, साधना, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का महापर्व है।
मम दीक्षा-शिक्षाचार्य, विरागकुल गौरव, सारस्वत कवि, डॉ. परम पूज्य विभव सागर जी गुरुदेव के श्रीचरणों में अक्षय-अनंत श्रद्धा, विनय और कोटिशः नमन।
— आर्यिका अर्हंश्री माताजी
(चातुर्मास – मंगल विहार, जयपुर)
द्वारा: पदम जैन बिलाला


