
ललितपुर | शाबाश इंडिया।
दशलक्षण धर्म के दस सूत्र जीवन को निर्मल और सार्थक बनाने का मार्ग
✍️ डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर
पर्युषण पर्व जैन संस्कृति का आत्मशुद्धि और आत्मजागरण का महापर्व है। यह केवल उपवास, पूजन और धार्मिक अनुष्ठानों का अवसर नहीं, बल्कि अपने भीतर झांकने, कषायों को पहचानने और जीवन को परिष्कृत करने का अवसर है। यह पर्व हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का कारण बन सकता है। यह ऐसा अवसर है, जो आत्मा पर जमी विकारों की कालिमा को दूर करने की प्रेरणा देता है।
दिगम्बर एवं श्वेतांबर जैन परंपराओं में यह पर्व श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। पर्युषण का अर्थ ‘परि’ यानी चारों ओर और ‘उषण’ यानी धर्म की आराधना से जोड़ा जाता है। वर्षभर के सांसारिक क्रिया-कलापों के कारण जीवन में जो दोष उत्पन्न होते हैं, उन्हें दूर करने का प्रयास इस दौरान किया जाता है। शरीर के पोषण में तो हम पूरा वर्ष व्यतीत कर देते हैं, लेकिन पर्व के इन दिनों में आत्मा के पोषण के लिए व्रत, नियम, त्याग और संयम को अपनाया जाता है।
जैन परंपरा में मनाया जाने वाला दसलक्षण पर्व हमें क्रोध, मान, माया और लोभ से ऊपर उठकर क्षमा, विनय, सरलता, संतोष और आत्मसंयम की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। आज मनुष्य भौतिक प्रगति के बावजूद तनाव, स्पर्धा, लोभ, अहंकार तथा पारिवारिक और सामाजिक अशांति से घिरा हुआ है। ऐसे समय में दशलक्षण धर्म के दस सूत्र जीवन के लिए प्रकाश-स्तंभ बन सकते हैं।
धर्म : बाहरी आडंबर नहीं, आंतरिक परिवर्तन
धर्म को केवल बाहरी क्रियाकांड तक सीमित कर देना उसके वास्तविक स्वरूप को छोटा करना है। जैन दर्शन में धर्म का लक्ष्य आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप की ओर ले जाना है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इसी मार्ग के आधार हैं।
केवल यह जान लेना कि क्रोध करना बुरा है, धर्म नहीं है; क्रोध के क्षण में स्वयं को रोक पाना धर्म है। असत्य पाप है, यह जानना पर्याप्त नहीं; विपरीत परिस्थिति में भी सत्य का पालन करना धर्म है। शास्त्रों का ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह हमारे आचरण को बदल दे। इसीलिए पर्युषण का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि हमने कितनी पूजा की, बल्कि यह है कि हमने अपने भीतर कितना परिवर्तन किया।
दशलक्षण : आत्मोन्नति की दस सीढ़ियां
जैन आगम-परंपरा के प्रमुख ग्रंथ तत्त्वार्थ सूत्र में उमास्वामी जी ने कहा है—“उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिञ्चन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः।”
उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिञ्चन्य और ब्रह्मचर्य—ये दस धर्म आत्मशुद्धि की क्रमिक सीढ़ियां हैं।
क्षमा : क्रोध पर विजय
क्रोध विवेक को ढक देता है और संबंधों में विष घोल देता है। क्षमा का अर्थ केवल किसी को माफ कर देना नहीं, बल्कि अपने भीतर के द्वेष को समाप्त करना है। क्रोध अग्नि है तो क्षमा उसका शीतल जल। जहां क्षमा है, वहां वैर अधिक देर टिक नहीं सकता।
मार्दव : अहंकार का विसर्जन
धन, पद, ज्ञान और प्रतिष्ठा का अहंकार मनुष्य को दूसरों से दूर कर देता है। मार्दव हमें विनम्रता सिखाता है। बीज जब अपना कठोर आवरण छोड़ता है, तभी वृक्ष बनता है। उसी प्रकार अहंकार हटने पर व्यक्तित्व में विनय और आत्मिक विकास का अंकुर फूटता है।
आर्जव : कथनी और करनी की एकरूपता
आर्जव का अर्थ है—सरलता, निष्कपटता और मन-वचन-कर्म की एकरूपता। मंदिर में अहिंसा और सत्य की चर्चा तथा व्यवहार में छल-कपट—यह दोहरा जीवन धर्म नहीं हो सकता। कथनी और करनी का मिलन ही आर्जव है।
शौच : लोभ से मुक्ति
शौच का आध्यात्मिक अर्थ केवल बाहरी स्वच्छता नहीं, बल्कि लोभ और तृष्णा से मन की निर्मलता है। इच्छाएं बढ़ती जाती हैं और संतोष घटता जाता है। वस्तुओं का संग्रह सुख नहीं देता; उनके प्रति आसक्ति का क्षय ही वास्तविक शुचिता है।
सत्य : वाणी की पवित्रता
सत्य केवल सही शब्द बोलना नहीं, बल्कि हितकारी और विवेकपूर्ण वाणी बोलना भी है। कटु वचन संबंधों को तोड़ सकते हैं और मधुर वचन हृदयों को जोड़ सकते हैं। इसलिए सत्य चर्चा का विषय नहीं, चर्या का विषय है।
संयम : जीवन का अनुशासन
मन और इंद्रियों को मर्यादा में रखना संयम है। भोजन, वाणी, विचार और व्यवहार में विवेक ही संयम का स्वरूप है। व्यसन-मुक्त जीवन, अहिंसक व्यवहार और मर्यादित उपभोग आज के समय में संयम की अत्यंत आवश्यक अभिव्यक्तियां हैं।
तप : विकारों को तपाना
तप का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि इच्छाओं और कषायों का क्षय करना है। उपवास तभी सार्थक है, जब उसके साथ विषय-कषायों का भी उपवास हो। सच्चा तप शरीर को नहीं, विकारों को तपाता है।
त्याग : संग्रह से सेवा की ओर
त्याग का अर्थ केवल वस्तुओं को छोड़ना नहीं, बल्कि उनके प्रति आसक्ति को छोड़ना है। गृहस्थ जीवन में दान, सेवा, परोपकार और लोककल्याण त्याग की सुंदर अभिव्यक्तियां हैं। धन की सार्थकता उसके संग्रह में नहीं, बल्कि सदुपयोग में है।
आकिञ्चन्य : परिग्रह से स्वतंत्रता
परिग्रह केवल धन-संपत्ति का नहीं, पद, प्रतिष्ठा, संबंध और अहंकार का भी हो सकता है। आकिञ्चन्य हमें सिखाता है कि संसार में रहते हुए वस्तुओं का उपयोग करें, लेकिन उन्हें अपने सुख और अस्तित्व का आधार न बनाएं। कम आसक्ति ही अधिक स्वतंत्रता है।
ब्रह्मचर्य : आत्मा की ओर यात्रा
ब्रह्मचर्य का व्यापक अर्थ आत्मा में रमण करना है। इंद्रिय-संयम, विचारों की पवित्रता, चरित्र की मर्यादा और आत्मचिंतन इसके प्रमुख आयाम हैं। भोग से योग और विषय से आत्मा की ओर यात्रा ही ब्रह्मचर्य की वास्तविक दिशा है।
आज की आवश्यकता : धर्म जीवन में उतरे
आज समाज को केवल धार्मिक आयोजनों की नहीं, बल्कि धार्मिक मूल्यों के आचरण की आवश्यकता है। क्षमा परिवारों को बचा सकती है, मार्दव अहंकार को कम कर सकता है, आर्जव भ्रष्टाचार को चुनौती दे सकता है, शौच लोभ को सीमित कर सकता है, सत्य विश्वास पैदा कर सकता है और संयम जीवन को अनुशासित कर सकता है।
इसलिए दशलक्षण पर्व किसी एक समुदाय तक सीमित संदेश नहीं देता, बल्कि समूची मानवता को चरित्र, करुणा, संयम और आत्मजागरण की दिशा दिखाता है।
पर्व के बाद भी जीवित रहें दशलक्षण
दशलक्षण पर्व की सफलता केवल इस बात में नहीं है कि हमने कितने उपवास किए, कितनी पूजा की या कितने धार्मिक आयोजन किए। उसकी वास्तविक सफलता तब है, जब पर्व के बाद हमारा क्रोध कम हो, अहंकार झुके, वाणी मधुर हो, इच्छाएं सीमित हों और व्यवहार अधिक संयमित एवं करुणामय बने।
आइए, इस पावन पर्व पर हम केवल मंदिर में ही नहीं, अपने अंतर्मन में भी दीप जलाएं। केवल धर्म की चर्चा न करें, बल्कि धर्म को अपनी चर्या बनाएं।
क्षमा से क्रोध पर विजय, मार्दव से अहंकार का क्षय, आर्जव से निष्कपटता, शौच से लोभ का अंत और संयम, तप, त्याग, आकिञ्चन्य एवं ब्रह्मचर्य से आत्मा की ओर यात्रा—यही पर्युषण और दशलक्षण पर्व की वास्तविक साधना है।
यही पर्व का संदेश है—विकारों से विरक्ति, आत्मा से अनुरक्ति और जीवन में दशलक्षण धर्म की अभिव्यक्ति।
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