Thursday, July 23, 2026

संस्कार बदलेंगे तो बदलेगा जीवन, सम्यक दृष्टि ही आत्मकल्याण और मोक्ष का प्रथम द्वार : मुनि योगसागर जी महाराज

कोटा | शाबाश इंडिया।

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित अष्टान्हिका महापर्व एवं नौ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान महोत्सव के तृतीय दिवस श्रद्धा, भक्ति, आराधना और आध्यात्मिक साधना का अनुपम संगम देखने को मिला। प्रातःकाल से ही मंदिर परिसर णमोकार महामंत्र, जिनवाणी और भक्तिभाव से गुंजायमान रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने विधान, अभिषेक, पूजन एवं अर्घ्य समर्पण कर आत्मशुद्धि, विश्वशांति एवं समस्त जीवों के मंगल की कामना की।

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र के निदेशक हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि मंत्रोच्चार एवं विधि-विधान के साथ सिद्धचक्र महामंडल विधान सम्पन्न हुआ, जिसमें महिला एवं पुरुष श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि जीव अपने कर्मों और संस्कारों के कारण अनादिकाल से जन्म-मरण के चक्र में भटक रहा है। यदि मनुष्य आत्मनिरीक्षण करते हुए सम्यक दृष्टि, सदाचार और धर्ममय जीवन अपनाए, तो उसके लिए मोक्षमार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है। उन्होंने कहा कि संस्कारों में परिवर्तन ही जीवन परिवर्तन का आधार है और सम्यक दृष्टि आत्मकल्याण एवं मोक्ष का प्रथम द्वार है।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का उदाहरण देते हुए मुनिश्री ने कहा कि श्रीराम और रावण का युद्ध व्यक्तिगत प्रतिशोध का नहीं, बल्कि धर्म, सत्य, वचन और मर्यादा की रक्षा का प्रतीक था। सम्यक दृष्टि हिंसा का समर्थन नहीं करती, बल्कि धर्म और न्याय की स्थापना के लिए कर्तव्य पालन की प्रेरणा देती है।

मुनिश्री ने कहा कि अष्टान्हिका महापर्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, विवेक, सद्भाव और संस्कारों के परिष्कार का महापर्व है। उन्होंने सल्लेखना के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह केवल मृत्यु का व्रत नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन की साधना का सर्वोच्च संस्कार है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने अंतिम क्षणों को मंगलमय बनाने के लिए आज से ही संयम, व्रत और आत्मशुद्धि का अभ्यास प्रारंभ करना चाहिए।

मुख्य संयोजक धर्मचंद जैन धानोप्या एवं अर्चना सर्राफ ने बताया कि सिद्धचक्र महामंडल विधान के तृतीय दिवस 64 ऋद्धियों के अर्घ्य श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ समर्पित किए गए। श्रद्धालुओं ने अभिषेक, पूजन, अर्घ्य समर्पण और मंगल आरती में भाग लेकर विश्वशांति, आत्मकल्याण तथा समस्त जीवों के मंगल की कामना की।

समिति के उपाध्यक्ष सुमित जैन एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमती सुशीला एवं श्री विवेक ठोरा परिवार ने नेहल के जन्मदिवस के अवसर पर प्राप्त किया। वहीं श्री सन्नी बगड़ा, श्री राजेन्द्र एवं श्री हुकम जैन ‘काका’ हरसोरा परिवार भी पुण्यार्जन में सहभागी बने। भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री सन्नी बगड़ा ने किया, जबकि श्रावक श्रेष्ठी एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन नेहल एवं सन्नी द्वारा श्रद्धापूर्वक सम्पन्न किया गया।

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