जयपुर। शाबाश इंडिया।

चारित्र चक्रवर्ती प्रथम जैनाचार्य श्री 108 शांति सागर मुनिराज की पावन समाधि-स्थली सिद्धक्षेत्र कुन्थलगिरि ने 5 जुलाई 2026 की रात्रि 11:34 बजे एक और आध्यात्मिक इतिहास को अपने में समाहित किया। ऊष्मा, सुषमा, प्रेरणा और उजाले के प्रतीक क्षपकराज मुनि श्री 108 वर्धमान सागर जी (दक्षिण) ने तेरह दिवसीय यम-सल्लेखना साधना पूर्ण कर उत्कृष्ट समाधि का वरण किया।
मुनि कुलभूषण एवं देशभूषण की समाधि-स्थली के रूप में विख्यात इस पावन सिद्धक्षेत्र में मुनि श्री वर्धमान सागर जी की समाधि ने त्याग, तप, संयम और आत्मविजय की दिगंबर जैन परंपरा में एक और स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया।
मोह, लोभ और पदासक्ति से पूर्णतः विरक्त क्षपकराज मुनि वर्धमान सागर जी ने अपने जीवनकाल में ही अद्वितीय दूरदर्शिता का परिचय देते हुए 20 फरवरी 2026 को महाराष्ट्र के सांगली में मुनि श्री 108 विद्या सागर जी महाराज (दक्षिण) को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। यह निर्णय उनकी निष्पृहता, संगठन क्षमता और आत्मनिष्ठ जीवन का अनुपम उदाहरण माना गया।
आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज का पूर्वाश्रम नाम श्री पायगोंडा अडगोंडा पाटिल था। आपका जन्म 3 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के निमशिरगांव में श्री अडगोंडा पाटिल एवं श्रीमती मुरुदेवी पाटिल के परिवार में हुआ। आपने बी.ए. एवं बी.एड. तक शिक्षा प्राप्त की। बचपन से ही अध्ययनशीलता, धार्मिक चिंतन और आध्यात्मिक रुचि आपके व्यक्तित्व की विशेष पहचान रही।
आत्मकल्याण और वैराग्य की भावना से प्रेरित होकर आपने 2 फरवरी 2004 को महाराष्ट्र के इचलकरंजी में आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी महाराज (अंकलीकर) के करकमलों से दिगंबर मुनि दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के बाद कठोर संयम, तप, स्वाध्याय और धर्म प्रभावना के माध्यम से आपने श्रमण संस्कृति को समृद्ध किया।
आपकी साधना, विद्वत्ता, संघ संचालन क्षमता एवं धर्म प्रभावना से प्रभावित होकर आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी महाराज ने 18 फरवरी 2011 को महाराष्ट्र के कोथली में आपको आचार्य पद से विभूषित किया। त्याग, तप, संयम और आत्मानुशासन से ओतप्रोत आपका जीवन दिगंबर जैन परंपरा की अमूल्य धरोहर रहा।
संलेखना अवधि के दौरान 26 जून को जनकपुरी, जयपुर निवासी युवा श्रद्धालु कमलेश पाटनी को क्षपकराज मुनि श्री वर्धमान सागर जी के अभिषेक, शांतिधारा दर्शन एवं रात्रिकालीन वैयावृत्ति का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि ऐसी अलौकिक संलेखना का प्रत्यक्ष दर्शन उनके जीवन का अविस्मरणीय अनुभव बन गया।
श्रद्धालुओं के अनुसार आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज ने 23 जून 2026 को साता-पूर्वक यम-सल्लेखना का संकल्प घोषित किया था। यह उनके प्रगाढ़ वैराग्य, आत्मकल्याण की साधना और जैन श्रमण परंपरा के प्रति अखंड समर्पण का दिव्य प्रमाण था। इस दौरान नवाचार्य श्री 108 विद्या सागर जी महाराज के मार्गदर्शन में संघस्थ साधुओं ने सेवा, वैयावृत्ति एवं आराधना में पूर्ण समर्पण भाव से योगदान दिया।
जयपुर सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु कुन्थलगिरि पहुंचे और क्षपकराज मुनि श्री वर्धमान सागर जी के दर्शन कर उनकी महान साधना की अनुमोदना की। उनका तप, त्याग, संयम और आत्मसाधना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत रहेगा।
जनकपुरी में विराजित आचार्य आदित्य सागर जी मुनिराज द्वारा धर्मसभा में क्षपकराज मुनि श्री 108 वर्धमान सागर जी (दक्षिण) को विनयांजलि एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

नमन एवं वंदन — पदम जैन बिलाला, जनकपुरी, जयपुर


