शाबाश इंडिया

जिनशासन के सूर्य, राष्ट्रसंत, युग-प्रतिक्रमण प्रवर्तक एवं गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज के तृतीय समाधि दिवस (4 जुलाई) पर जैन समाज ने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। वे 4 जुलाई 2024 को रात्रि 2:30 बजे महाराष्ट्र के जालना के समीप देवमूर्ति ग्राम में महासमाधि को प्राप्त हुए थे।
गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज ने अपने 44 वर्षों के संयमकाल में 350 से अधिक साधु-साध्वियों को दीक्षा प्रदान कर उन्हें मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर किया। 17 वर्ष की आयु में दीक्षित होकर उन्होंने युग-प्रतिक्रमण परंपरा को पुनर्जीवित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और जैन समाज में आध्यात्मिक जागरण का व्यापक संदेश दिया।
उनका जन्म 2 मई 1963 को मध्यप्रदेश के दमोह जिले के पथरिया में हुआ था। आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज से उन्हें क्षुल्लक दीक्षा, तथा आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज से मुनि दीक्षा प्राप्त हुई। वर्ष 1992 में सिद्धक्षेत्र द्रोणगिरि में उन्हें आचार्य पद की प्राप्ति हुई।
अपने जीवनकाल में उन्होंने विशाल संघ का नेतृत्व करते हुए अनेक ऐतिहासिक युग-प्रतिक्रमण एवं यति सम्मेलनों का आयोजन कराया, जिनमें जयपुर (2012), झाँसी (2017) और पथरिया (2023) प्रमुख रहे। इन आयोजनों ने प्राचीन जैन परंपराओं के पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज एक सृजनशील साहित्यकार भी थे। उनकी प्रमुख कृतियों में शुद्धोपयोग, सम्यक दर्शन, सल्लेखना से समाधि, तीर्थंकर ऐसे बने, कर्म विज्ञान सहित अनेक ग्रंथ शामिल हैं, जो जैन दर्शन के गहन सिद्धांतों को सरल रूप में प्रस्तुत करते हैं।
उनके द्वारा दीक्षित अनेक आचार्य—जैसे आचार्य श्री विमर्श सागर जी, विशुद्ध सागर जी, विशद सागर जी, विभव सागर जी सहित अन्य—आज अपने-अपने विशाल संघों के माध्यम से धर्म प्रभावना का कार्य कर रहे हैं।
वर्ष 2025 में इंदौर में आयोजित ऐतिहासिक पट्टाचार्य पदारोहण महोत्सव में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज को गणाचार्य श्री विराग सागर जी के संघ का पट्टाचार्य घोषित किया गया, जिससे उनकी परंपरा का विस्तार और सुदृढ़ हुआ।
जैन समाज ने इस अवसर पर गणाचार्य श्री के चरणों में श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।


