महिदपुर में विमान महोत्सव, मुनि ससंघ के सान्निध्य में जगत कल्याण हेतु महा शांति धारा
आज ईसागढ़ में भव्य वेदी प्रतिष्ठा एवं राष्ट्रसंत का मंगल नगर प्रवेश
अशोकनगर। चलते-चलते थक जाए देह, फिर भी आत्मा कहती है—अभी कुछ बाकी है। जहाँ दुनिया की सोच समाप्त होती है, वहीं से भारतीय संस्कृति आरंभ होती है। उक्त भावपूर्ण उद्गार राष्ट्रसंत मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज ने महिदपुर में आयोजित विमान महोत्सव समारोह को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मनुष्य बाहरी सुख की खोज में भटकता रहता है—चंद्रमा तक पहुँचने की आकांक्षा रखता है—पर सच्चा आनंद भीतर ही है। यह अवस्था उस मृग के समान है जो कस्तूरी की सुगंध के लिए जंगल-जंगल भटकता है, जबकि सुगंध उसी की नाभि में होती है। संसार के जीव की यही दशा है। मध्यप्रदेश महासभा के संयोजक विजय धुर्रा ने बताया कि परम पूज्य गुरुदेव महिदपुर से विजयपुरा की ओर पदविहार करते हुए सायंकाल जिज्ञासा समाधान समारोह को संबोधित करेंगे। प्रातः ईसागढ़ में श्री दिगम्बर जैन नाका मंदिर पर बाल ब्रह्मचारी प्रतिष्ठाचार्य मुकेश भैया के निर्देशन में वेदी प्रतिष्ठा समारोह होगा, जिसके साथ गुरुदेव का संघ सहित भव्य मंगल प्रवेश संपन्न होगा। इस हेतु ईसागढ़ जैन समाज द्वारा व्यापक तैयारियाँ की गई हैं। इसके पूर्व प्रातः देरखा ग्राम से विहार करते हुए मुनि श्री महिदपुर पहुँचे, जहाँ कस्बावासियों ने भव्य स्वागत किया। भगवान जिनेन्द्र देव की विमान जी के साथ शोभायात्रा निकाली गई, मार्ग में श्रद्धालुओं ने आरती उतारी एवं श्रीफल अर्पित किए। इस अवसर पर गुरुदेव के श्रीमुख से जगत कल्याण हेतु महा शांति धारा हुई, जिसका सौभाग्य अनेक भक्त परिवारों को प्राप्त हुआ। धर्मसभा में राष्ट्रसंत श्री सुधासागरजी महाराज ने प्रह्लाद-हिरण्यकश्यप प्रसंग के माध्यम से समझाया कि भगवान को देखने के लिए प्रह्लाद जैसी दृष्टि चाहिए—जहाँ श्रद्धा होती है, वहाँ पाषाण में भी भगवान प्रकट हो जाते हैं। उन्होंने श्रीराम के वनवास प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि दुःखों के पहाड़ के बीच भी महापुरुष विचलित नहीं होते; उनके जीवन से हर क्षण आनंद की प्रेरणा मिलती है। छोटे से महिदपुर ने विराट श्रद्धा का परिचय दिया। 51 स्वर्ण थालों, 51 स्वर्ण कलशों एवं रजत चौकी के साथ मुनिपुंगव के चरण प्रक्षालन का दृश्य अत्यंत दुर्लभ व प्रेरक रहा। अशोकनगर जिले का यह छोटा ग्राम आज इतिहास का साक्षी बना—जहाँ सच्ची श्रद्धा ने विराट रूप धारण किया।


