Friday, March 6, 2026

समाज की सोच से ऊपर उठने का साहस

समाज की सोच से ऊपर उठकर ही इंसान अपनी पहचान बना सकता है। यह बात सुनने में जितनी सरल लगती है, जीवन में उतनी ही कठिन साबित होती है। क्योंकि समाज हमेशा हमें एक तय दायरे में चलने की सलाह देता है—क्या करना है, कैसे करना है, किससे मिलना है, कौन-सा रास्ता चुनना है। लेकिन सच्चाई यह है कि जो व्यक्ति इन सीमाओं से परे जाकर अपने दिल और विवेक की सुनता है, वही अपनी अलग पहचान बनाता है। भीड़ के साथ चलना आसान है, लेकिन भीड़ से अलग रास्ता बनाना साहस मांगता है।

लोग आपकी आलोचना करेंगे, आपकी नीयत पर सवाल उठाएंगे, आपकी प्रगति से जलेंगे भी। परंतु जब इंसान अपनी सोच को ईमानदारी, मेहनत और सच्चाई से जोड़ लेता है, तब वही समाज जिसकी बातें हमें रोकती थीं, एक दिन उसी इंसान की मिसालें देने लगता है। पहचान कभी भी भीड़ में घुलकर नहीं बनती, पहचान तब बनती है जब इंसान बिना डर, बिना दिखावा और बिना झुकाव के अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है। इसलिए ज़िंदगी में कभी भी समाज की नज़रों से नहीं, अपने कर्मों से अपनी क़ीमत तय करनी चाहिए। जो व्यक्ति अपने रास्ते खुद बनाता है, वही कल दूसरों के लिए रास्ता बन जाता है।


— नितिन जैन
संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा)
जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल

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