
विशेष आलेख | शाबाश इंडिया।
पदम चन्द गाँधी
मो. 9414967294
दीपावली जैन संस्कृति का महान आध्यात्मिक पर्व है। जैन मान्यता के अनुसार, इस दिन दो महान आध्यात्मिक घटनाएं घटित हुईं। एक ओर भगवान महावीर को निर्वाण की प्राप्ति हुई, तो दूसरी ओर उनके प्रथम गणधर इंद्रभूति गौतम स्वामी को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। यही कारण है कि जैन परंपरा में दीपावली केवल दीप जलाने का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, त्याग और मोक्ष का संदेश देने वाला पावन पर्व है।
पौराणिक एवं जैन आगम परंपरा के अनुसार, पावापुरी के राजा हस्तिपाल के आग्रह पर भगवान महावीर वहां पधारे थे। प्रभु सर्वज्ञ थे और जानते थे कि यह उनका अंतिम वर्षावास है। निरंतर धर्मोपदेश देते हुए तीन माह और चौदह दिन व्यतीत हुए। इसके बाद देवराज इंद्र ने समवशरण की रचना की, जिसमें तिर्यंच, मनुष्य और देवगति के जीव उपस्थित हुए। भगवान की दिव्य देशना का ऐसा प्रभाव था कि प्रत्येक जीव उसे अपनी-अपनी भाषा में समझता था।
भगवान महावीर ने अपनी अंतिम धर्मदेशना में सुकृत-दुष्कृत के फल, सुख-विपाक और दुःख-विपाक का विवेचन करते हुए जीव के सुख-दुःख के कारणों और उनके निवारण का मार्ग बताया। यह उपदेश विपाकसूत्र के रूप में जाना जाता है। इसके पश्चात उन्होंने आचार धर्म का उपदेश दिया, जो उत्तराध्ययन सूत्र के रूप में प्रसिद्ध है। विनय, परीषह, संयम, ब्रह्मचर्य, तप, तितिक्षा, निस्पृहता और श्रुताभ्यास जैसे विषयों से समृद्ध इस आगम को जैन परंपरा में विशेष महत्व प्राप्त है।
धर्मदेशना देते हुए भगवान महावीर ने उत्तराध्ययन सूत्र के 37वें अध्ययन के समय शुक्लध्यान के चतुर्थ चरण को प्राप्त किया और समस्त कर्मों का क्षय कर निर्वाण प्राप्त किया। अंतिम समय में उन्होंने गौतम गणधर को देवशर्मा ब्राह्मण को प्रतिबोध देने के लिए भेज दिया था। भगवान के प्रति गौतम स्वामी की गहरी आसक्ति और अनुराग उनके केवलज्ञान में बाधक थे। प्रभु के निर्वाण के पश्चात जब उनकी आसक्ति समाप्त हुई और वे आत्मस्वरूप में स्थित हुए, तब उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। इस प्रकार एक ओर भगवान महावीर का निर्वाण हुआ और दूसरी ओर गौतम स्वामी केवलज्ञानी बने।
जैन मान्यता के अनुसार, भगवान महावीर के निर्वाण के अवसर पर देवताओं ने दीप प्रज्वलित कर निर्वाण महोत्सव मनाया। मानव समुदाय ने भी जिनेंद्र भगवान की पूजा-अर्चना कर निर्वाण लड्डू अर्पित किए। गौतम स्वामी को केवलज्ञान प्राप्त होने की प्रसन्नता में ज्ञान के प्रतीक स्वरूप दीपमालाएं प्रज्वलित की गईं। इस प्रकार दीपों का प्रकाश आत्मज्ञान और अज्ञान के अंधकार को दूर करने का प्रतीक बन गया। दीपावली का संदेश भी यही है—अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना।
धनतेरस का आध्यात्मिक संदेश
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को भगवान महावीर ने बाहरी समवशरण और सांसारिक उपाधियों से विरक्त होकर मन, वचन और काया के तीनों योगों का निरोध किया। इस तिथि को जैन परंपरा में धन्य तेरस के रूप में विशेष महत्व प्राप्त है। यह पर्व त्याग और आत्मसंयम की प्रेरणा देता है। इसका संदेश है कि हम मन, वचन और काया से होने वाली बुरी प्रवृत्तियों का त्याग करें तथा बाहरी आकर्षणों से हटकर आत्मा के शाश्वत रत्नत्रय—सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र—की प्राप्ति का प्रयास करें।
रूप चौदस और गोवर्धन का महत्व
चतुर्दशी के दिन भगवान महावीर ने अपनी साधना की पूर्णता प्राप्त कर अयोगी अवस्था में प्रवेश किया और निर्वाण की ओर अग्रसर हुए। शील और संयम के महत्व को ध्यान में रखते हुए इस दिन ब्रह्मचर्य एवं तप की आराधना का विशेष विधान माना जाता है। अनेक श्रद्धालु इस अवसर पर छठम यानी तेला तप की साधना करते हैं।
जैन परंपरा में गोवर्धन के दिन भगवान की दिव्य ध्वनि और जिनवाणी के महत्व का स्मरण किया जाता है। ‘गो’ का अर्थ जिनवाणी और ‘वर्धन’ का अर्थ उसका विस्तार माना जाता है। इस अवसर पर उत्तराध्ययन सूत्र का वाचन किया जाता है, जिससे श्रद्धालुओं को चारित्र धर्म के पालन की प्रेरणा मिलती है।
दीपावली के अवसर पर जैन धर्मावलंबी अपने बहीखातों में गौतम स्वामी जैसी लब्धि, बाहुबली जैसा बल और अभयकुमार जैसी बुद्धि प्राप्त करने की मंगल भावना के साथ अष्टमंगल एवं स्वस्तिक आदि शुभ प्रतीक अंकित करते हैं। साथ ही ‘महावीर पहुंंच्या निर्वाण, गौतम स्वामी केवलज्ञान’ की माला फेरकर भगवान महावीर के निर्वाण और गौतम स्वामी के केवलज्ञान का स्मरण करते हैं।
इस प्रकार जैन दर्शन में दीपावली का महत्व केवल बाहरी प्रकाश तक सीमित नहीं है। यह आत्मा को अज्ञान, मोह और आसक्ति के अंधकार से मुक्त कर ज्ञान, संयम और आत्मकल्याण के प्रकाश की ओर ले जाने वाला पर्व है। भगवान महावीर के निर्वाण और गौतम स्वामी के केवलज्ञान की स्मृति में प्रज्वलित दीपमालाएं आज भी हमें यही संदेश देती हैं कि सच्चा प्रकाश बाहरी जगत में नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर ज्ञान के जागरण में है।
आइए, इस दीपावली हम भी अपने भीतर ज्ञान का दीप प्रज्वलित करें और त्याग, संयम, अहिंसा एवं आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लें।


