
जयपुर/उदयपुर | शाबाश इंडिया।
मांडणा, रंगोली और मंदिर शिल्प में छिपे भारतीय ज्ञान के अनूठे आयामों को शोध के माध्यम से किया उजागर
राजस्थान की लोकसंस्कृति में रची-बसी सूर्य उपासना केवल धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सदियों पुरानी ज्ञान परंपरा, कलात्मक चेतना और स्थापत्य कौशल की जीवंत विरासत भी है। भारतीय संस्कृति के इसी महत्वपूर्ण पहलू को बड़ीसादड़ी निवासी चित्रकला विशेषज्ञ डॉ. दीपक सालवी ने अंतरराष्ट्रीय अकादमिक मंच पर अपने शोध के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के राजस्थान अध्ययन केंद्र में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में डॉ. सालवी ने ‘सन वर्शिप इन राजस्थानी फोक आर्ट एंड टेम्पल आर्किटेक्चर’ विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया। इसमें उन्होंने मेवाड़ एवं दक्षिणी राजस्थान की सूर्य आराधना से जुड़ी कला और स्थापत्य विरासत के विविध आयामों को सामने रखा।
शोधपत्र की विशेषता यह रही कि इसमें सूर्य उपासना को केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रखते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा के तीन प्रमुख आधारों—वास्तु, कला और दर्शन—के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित किया गया। सूर्य मंदिरों की स्थापत्य संरचनाओं, मूर्तिशिल्प और कलात्मक अलंकरण के साथ ग्रामीण अंचलों में प्रचलित मांडणा एवं रंगोली जैसी लोककलाओं के सांस्कृतिक और दार्शनिक पक्षों को भी उजागर किया गया।
नांदेशमा और मंदेसर के मंदिर बने शोध का आधार
डॉ. सालवी ने नांदेशमा एवं मंदेसर के प्राचीन मंदिरों को क्षेत्रीय शिल्प और स्थापत्य परंपराओं के विशिष्ट उदाहरणों के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति में सूर्य केवल प्रकाश और ऊर्जा के स्रोत नहीं, बल्कि जीवन, प्रकृति और सृष्टि के निरंतर गतिशील चक्र के प्रतीक भी हैं। यही अवधारणा मंदिर निर्माण से लेकर लोककलाओं की विभिन्न अभिव्यक्तियों तक में दिखाई देती है।
शोध में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि राजस्थान की मूर्त एवं अमूर्त सांस्कृतिक धरोहरों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और अकादमिक अध्ययन भावी पीढ़ियों के लिए अत्यंत आवश्यक है।
उल्लेखनीय है कि डॉ. सालवी वर्तमान में राजकीय मीरा कन्या महाविद्यालय, उदयपुर के चित्रकला विभाग में सहायक आचार्य के पद पर कार्यरत हैं। वे शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार एवं कॉलेज शिक्षा विभाग, जयपुर से संबंधित राष्ट्रीय शोध परियोजना से भी जुड़े हैं।
उनका यह अध्ययन राजस्थान की प्राचीन कलात्मक विरासत को आधुनिक शोध और वैश्विक अकादमिक विमर्श से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
रिपोर्ट : राकेश शर्मा ‘राजदीप’


