
उदयपुर | शाबाश इंडिया।
सत्य भूषण शर्मा – प्रवक्ता, पत्रकार, लेखक, कवि एवं यूट्यूबर
अधर्म का बदलता स्वरूप
अधर्म केवल धार्मिक मान्यताओं की अवहेलना नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, नैतिकता और मानवीय मूल्यों के विरुद्ध किया गया आचरण है। जब स्वार्थ के लिए असत्य का सहारा लिया जाता है, भ्रष्टाचार को सामान्य व्यवहार मान लिया जाता है और अन्याय के सामने सामर्थ्यवान लोग भी मौन रहते हैं, तब अधर्म व्यक्तिगत कमजोरी से आगे बढ़कर सामाजिक संकट बन जाता है। आज आवश्यकता है कि हम अधर्म के वास्तविक स्वरूप को पहचानें और उसके कारणों तथा निवारण पर गंभीरता से विचार करें।
धर्म और अधर्म: आचरण की कसौटी
भारतीय संस्कृति में धर्म का व्यापक अर्थ कर्तव्यपालन, सत्यनिष्ठा, करुणा, न्याय और लोककल्याण है। धर्म की पहचान बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि व्यक्ति के आचरण से होती है। कोई व्यक्ति धार्मिक कर्मकांडों का पालन करते हुए भी अन्याय कर सकता है, जबकि ईमानदारी, परोपकार और मानवता के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति धर्म के वास्तविक स्वरूप को प्रकट करता है।
महाभारत में द्रौपदी के अपमान का प्रसंग इस बात का प्रतीक है कि अन्याय करने वाला ही नहीं, बल्कि सामर्थ्य होते हुए भी अन्याय के विरुद्ध मौन रहने वाला भी नैतिक प्रश्नों के घेरे में आता है। जब समाज का विवेक मौन हो जाता है, तब अधर्म को विस्तार का अवसर मिलता है।
आधुनिक समाज में अधर्म की चुनौतियाँ
वर्तमान समय में अधर्म अनेक रूपों में दिखाई देता है। भ्रष्टाचार, आर्थिक शोषण, महिलाओं के प्रति हिंसा, जातिगत भेदभाव, कमजोर वर्गों के अधिकारों की उपेक्षा और सत्ता का दुरुपयोग इसके प्रमुख उदाहरण हैं। शिक्षा में नैतिक मूल्यों के स्थान पर केवल अंकों और लाभ को प्राथमिकता देना भी चिंताजनक है।
डिजिटल युग में झूठी खबरें, भ्रामक प्रचार, चरित्रहनन और घृणा फैलाने वाली सामग्री सामाजिक विश्वास को कमजोर कर रही हैं। तकनीक स्वयं अच्छी या बुरी नहीं होती; उसका स्वरूप उसके उपयोग की नैतिकता से निर्धारित होता है।
अधर्म के विस्तार के पीछे लालच, अहंकार, भय, स्वार्थ और नैतिक जिम्मेदारी से विमुखता प्रमुख कारण हैं। जब गलत रास्तों से लाभ उठाने वालों को सम्मान मिलने लगे और ईमानदार व्यक्ति उपेक्षित होने लगें, तब समाज की नैतिक नींव कमजोर पड़ने लगती है।
अधर्म का प्रतिकार: व्यक्ति से व्यवस्था तक
अधर्म का अंत केवल उपदेशों और नारों से संभव नहीं है। इसके लिए व्यक्ति, परिवार, शिक्षण संस्थानों, शासन और समाज को अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ निभानी होंगी।
व्यक्ति को अपने आचरण में सत्यनिष्ठा और ईमानदारी अपनानी चाहिए। परिवार तथा विद्यालयों में बच्चों को नैतिक मूल्यों की शिक्षा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से दी जानी चाहिए। शासन और प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही तथा कानून का निष्पक्ष पालन सुनिश्चित होना चाहिए। मीडिया और नागरिकों को भी सत्य के प्रति जिम्मेदार रहते हुए भ्रामक सूचनाओं तथा अन्याय का विवेकपूर्ण प्रतिरोध करना चाहिए।
धर्म की रक्षा का अर्थ किसी के प्रति घृणा फैलाना नहीं, बल्कि अन्याय, शोषण और अमानवीयता का विरोध करना है। श्रीराम का मर्यादापूर्ण जीवन और श्रीकृष्ण का विवेकपूर्ण कर्म-संदेश हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, सत्य, कर्तव्य और न्याय का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
परिवर्तन का आरंभ स्वयं से
अधर्म का सबसे खतरनाक रूप वह है, जिसे समाज सामान्य मानकर स्वीकार कर लेता है। जब झूठ को चतुराई, भ्रष्टाचार को विवशता और अन्याय के सामने मौन रहने को समझदारी कहा जाने लगे, तब आत्ममंथन अनिवार्य हो जाता है।
समाज की वास्तविक प्रगति केवल आर्थिक समृद्धि और तकनीकी विकास से नहीं, बल्कि नैतिक चेतना, सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदनशीलता से मापी जानी चाहिए। अधर्म का प्रतिकार तभी प्रभावी होगा, जब प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हो, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाए और अपने आचरण से दूसरों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करे।
अधर्म का अंधकार दूसरों को दोष देने से नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर सत्य, विवेक और नैतिक साहस का दीप जलाने से मिटेगा। धर्म केवल विचार या उपदेश नहीं, बल्कि जीवन में निभाया जाने वाला उत्तरदायित्व है। जब सत्य को साहस, न्याय को संरक्षण और मानवता को सर्वोच्च स्थान मिलेगा, तभी एक न्यायपूर्ण, संवेदनशील और सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव होगा।
स्व-घोषणा
मैं, सत्य भूषण शर्मा, घोषणा करता हूँ कि “अधर्म का विस्तार और धर्म का संकट: मानवता के समक्ष चुनौती” शीर्षक से प्रस्तुत यह आलेख मेरे द्वारा मौलिक रूप से तैयार किया गया है तथा पूर्व में प्रकाशित अथवा प्रसारित नहीं हुआ है।
लेखक: सत्य भूषण शर्मा – प्रवक्ता, पत्रकार, लेखक, कवि एवं यूट्यूबर
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