
जयपुर | शाबाश इंडिया।
मुनि श्री 108 विलोक सागरजी महाराज ने गुरुवार को त्रिवेणी नगर स्थित संत भवन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में जो मिला है, उसमें संतोष करना सीखें। जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि जीवन-निर्वाह के लिए उसके पास जो कुछ है, वह पर्याप्त है, तब वह सांसारिक इच्छाओं की अंधी दौड़ से बाहर निकलकर आत्मकल्याण और आध्यात्मिक विकास पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।
महाराज श्री ने कहा कि सांसारिक संपत्ति और इच्छाओं के प्रति बढ़ती आसक्ति से लोभ और दुख उत्पन्न होते हैं। जैन धर्म के अनुसार, सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं को एकत्र करने में नहीं, बल्कि मन की शांति और संतोष में है। संतोष का भाव व्यक्ति को ईर्ष्या, लालच और अन्य मानसिक विकारों से दूर रखता है। उन्होंने कहा कि हम अक्सर कल की चाह में आज को खो देते हैं, इसलिए वर्तमान में संतोष और आत्मचिंतन को महत्व देना चाहिए।
मंदिर समिति के अध्यक्ष महेंद्र काला एवं मुनि सेवा संघ के महावीर कासलीवाल ने बताया कि धर्मसभा से पूर्व दीप प्रज्ज्वलन, महाराज श्री का पाद प्रक्षालन और शास्त्र भेंट का सौभाग्य समाजश्रेष्ठी सुनील-बबीता एवं संजीव लुहाड़िया परिवार को प्राप्त हुआ। इसके बाद मंगलाचरण हुआ। प्रातःकाल महाराज श्री के सान्निध्य में मंदिरजी में शांतिधारा भी संपन्न हुई।
अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन परिषद के प्रचार प्रभारी (राजस्थान अंचल) नरेश कासलीवाल ने बताया कि मंदिर समिति के सदस्यों, महिला मंडल और समाजजनों ने महाराज श्री के प्रवचनों तथा शाम को आयोजित शंका समाधान कार्यक्रम का लाभ लिया। गुरुवार शाम मुनि श्री विलोक सागरजी महाराज ससंघ ने पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर, त्रिवेणी नगर से विहार कर श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, गायत्री नगर में मंगल प्रवेश किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।
नरेश कासलीवाल प्रचार प्रभारी (राजस्थान अंचल) अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन परिषद


