Saturday, September 26, 2026

क्षमावाणी : मन की गांठें खोलने और रिश्तों को संवारने का पर्व

ललितपुर | शाबाश इंडिया।

जैन धर्म का प्रत्येक पर्व आत्मजागरण का संदेश लेकर आता है। इन्हीं पर्वों में क्षमावाणी केवल परंपरा का निर्वाह नहीं, बल्कि अंतर्मन की धुलाई और संबंधों के पुनर्संस्कार का अवसर है। यह वह दिन है जब मनुष्य दूसरों की भूलों का हिसाब रखने के बजाय अपने भीतर झांकता है और स्वीकार करता है कि जाने-अनजाने उसके मन, वचन या कर्म से किसी जीव को पीड़ा पहुंची हो तो वह उसके लिए क्षमा मांगे।

संसार के पर्व प्रायः शुभकामनाओं, बधाइयों और उपहारों के आदान-प्रदान से जुड़े होते हैं, लेकिन क्षमावाणी की विशिष्टता यह है कि यहां प्रदर्शन नहीं, प्रायश्चित्त है; औपचारिकता नहीं, आत्मालोचन है; अधिकार नहीं, विनय है और प्रतिशोध नहीं, क्षमा है।

जैन परंपरा का अत्यंत मार्मिक सूत्र है—

“खम्मामि सव्वजीवाणं, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ती मे सव्वभूदेसु, वेरं मज्झं ण केणवि॥”

अर्थात्—मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूं, सभी जीव मुझे क्षमा करें। मेरी सभी जीवों के प्रति मैत्री है और किसी के प्रति मेरा वैर नहीं है।

यह केवल उच्चारित किया जाने वाला वाक्य नहीं, बल्कि जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला महामंत्र है। प्रश्न यह नहीं कि हमने कितनी बार ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कहा, वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारे हृदय से किसी के प्रति वैर की गांठ खुली? क्या हमारे भीतर किसी के प्रति संचित शिकायत पिघली? क्या हमारे अहंकार ने किसी के सामने झुकना सीखा?

क्षमा मांगना सरल प्रतीत होता है, लेकिन वास्तव में इसके लिए अहंकार का विसर्जन करना पड़ता है। क्षमा करना उससे भी बड़ी आंतरिक शक्ति मांगता है। क्रोध में मनुष्य क्षणभर के लिए अपना विवेक खो देता है। कषाय का आवेग उसे हित-अहित के भेद से दूर कर देता है। जैसे अग्नि जिस लकड़ी में उत्पन्न होती है, उसे भी जलाती है और आसपास को भी दग्ध करती है, वैसे ही क्रोध दूसरों को पीड़ा देने से पहले स्वयं के अंतर्मन को जलाता है।

इसीलिए क्षमा का अर्थ केवल किसी दूसरे को अपराध से मुक्त कर देना नहीं, बल्कि स्वयं को क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध की अग्नि से मुक्त करना भी है।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने क्षमा की इसी शक्ति को व्यक्त करते हुए लिखा है—

“क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,
उसका क्या जो दंतहीन, विषहीन, विनीत सरल हो।”

अर्थात् क्षमा निर्बलता का पर्याय नहीं है। जो प्रतिकार करने की सामर्थ्य रखते हुए भी प्रतिशोध का मार्ग छोड़ देता है, उसकी क्षमा में वास्तविक गरिमा होती है।

आचार्य अमितगति स्वामी ने मानव जीवन को समता और सद्भावना की दिशा देने वाली अत्यंत सुंदर प्रार्थना की है—

“सत्त्वेषु मैत्रीं गुणिषु प्रमोदं
क्लिष्टेषु जीवेषु कृपापरत्वम्।
माध्यस्थभावं विपरीतवृत्तौ,
सदा ममात्मा विदधातु देव॥”

अर्थात्—सभी प्राणियों के प्रति मेरे मन में मैत्री हो, गुणवानों को देखकर मुझे प्रमोद हो, दुःखी जीवों के प्रति मेरे हृदय में करुणा हो और विपरीत प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों के प्रति मेरे भीतर मध्यस्थ भाव बना रहे।

वस्तुतः क्षमावाणी इसी व्यापक जीवन-दृष्टि का पर्व है। प्राणिमात्र के प्रति मैत्री का अर्थ है संसार के किसी भी जीव के प्रति शत्रुता का भाव न रखना। गुणीजनों में प्रमोद का अर्थ है दूसरे की श्रेष्ठता देखकर ईर्ष्या नहीं, प्रसन्नता होना। दुःखी जीवों के प्रति करुणा का अर्थ है दूसरे के आंसू हमारे अंतर्मन को भी स्पर्श करें। वहीं विपरीत प्रवृत्ति वालों के प्रति माध्यस्थ भाव का अर्थ है—न अनावश्यक मित्रता, न प्रतिशोध, बल्कि समता और विवेक के साथ व्यवहार।

इन चारों भावों को जीवन में उतार लेना ही क्षमावाणी की वास्तविक साधना है।

हम अभी पूर्ण नहीं हुए हैं। यदि हम पूर्ण गुणों से संपन्न होते तो संसार के आकर्षणों और कषायों में भटकते ही क्यों? इसलिए जब अपने से अधिक गुणवान व्यक्ति सामने आए तो हमारा हृदय ईर्ष्या से नहीं, प्रमोद से भरना चाहिए। उसके गुणों को देखकर मन में यह भाव जागना चाहिए कि मैं भी अपने व्यक्तित्व को अधिक परिष्कृत करूं।

मेरी भावना की ये पंक्तियां भी प्रासंगिक हैं—

गुणीजनों को देख हृदय में मेरे प्रेम उमड़ आवे,
बने जहां तक उनकी सेवा करके यह मन सुख पावे।
होऊं नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे,
गुण-ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे।

किसी पीड़ित व्यक्ति की पीड़ा देखकर यदि हमारा हृदय करुणा से नहीं भरता तो हमारी धार्मिकता अभी बाहरी आवरण से आगे नहीं बढ़ी है। यथाशक्ति तन, मन और धन से किसी के दुःख को कम कर देना ही करुणा का व्यावहारिक रूप है।

सबसे कठिन है—“माध्यस्थभावं विपरीतवृत्तौ।” विपरीत प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के प्रति न घृणा, न प्रतिशोध और न ही भीतर लगातार जलते रहने की भावना—यह साधारण मनुष्य के लिए अत्यंत कठिन साधना है। जब हम किसी विरोधी से अधिक शक्तिशाली होते हैं तो प्रतिशोध लेकर अपने अहंकार को पुष्ट करने लगते हैं और जब सामने वाला शक्तिशाली होता है तो हम भीतर ही भीतर प्रतिशोध की अग्नि में जलते रहते हैं।

ऐसी स्थिति में मैत्री और शत्रुता दोनों से ऊपर उठकर माध्यस्थ भाव धारण करना ही आत्मविजय का मार्ग है।

आज का युग संवाद के विस्तार का युग है, लेकिन दुर्भाग्य से मनों की दूरियां भी बढ़ी हैं। छोटी-सी बात वर्षों की नाराजगी में बदल जाती है, शब्द रिश्तों में दरार डाल देते हैं और अहंकार क्षमा मांगने से रोक देता है। मनुष्य दूसरों की भूलों की सूची तो बना लेता है, किंतु अपनी भूलों का लेखा-जोखा करने से बचता है।

क्षमावाणी हमें इसी प्रवृत्ति से बाहर निकालती है। भूल होना प्रकृति है, भूल को स्वीकार करना संस्कृति है और भूल को सुधार लेना संस्कार है।

किसी की भूल को क्षमा कर देना और उसे आत्मग्लानि के बोझ से मुक्त कर देना बहुत बड़ा परोपकार है। क्षमा पाने वाला ही नहीं, क्षमा करने वाला भी हल्का होता है। जिस हृदय में वर्षों से द्वेष की गांठ बंधी हो, वहां शांति कैसे जन्म ले सकती है? प्रतिशोध की स्मृति को पकड़े रहना दूसरे को दंड देने से अधिक स्वयं को दंडित करना है।

इसलिए क्षमावाणी का संदेश केवल इतना नहीं कि वर्ष में एक दिन एक-दूसरे से ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कह दिया जाए। इसका वास्तविक संदेश है कि मन में ऐसी कोई गांठ ही न रहने दें, जिसे खोलने के लिए वर्ष भर प्रतीक्षा करनी पड़े।

क्षमा को केवल पर्व न बनाकर जीवन का स्वभाव बनाना होगा। घर में, परिवार में, समाज में, कार्यस्थल पर और प्रत्येक संबंध में संवाद का द्वार खुला रखना होगा। जहां संवाद जीवित रहता है, वहां संबंधों की मृत्यु नहीं होती।

आज जब समाज विभिन्न प्रकार के मतभेदों, तनावों और वैमनस्य से गुजर रहा है, क्षमावाणी हमें भीतर से पुकारती है—क्रोध छोड़ो, द्वेष छोड़ो, प्रतिशोध छोड़ो; अपने भीतर मैत्री, करुणा, प्रमोद और माध्यस्थ भाव को स्थान दो।

आइए, इस क्षमावाणी पर हम केवल दूसरों से क्षमा न मांगें, बल्कि स्वयं के भीतर भी उतरें। देखें कि किसके प्रति हमारे मन में अभी भी शिकायत है, किसके प्रति ईर्ष्या है, किससे हम नाराज हैं और किसके प्रति प्रतिशोध की कोई सूक्ष्म चिंगारी अब भी शेष है। फिर उन सभी गांठों को खोल दें।

क्योंकि क्षमा दूसरों पर किया गया उपकार नहीं, अपने ही आत्मस्वरूप पर किया गया अनुग्रह है।

आइए, पूरे अंतर्मन से कहें—“मिच्छामि दुक्कडम्।”

यदि मेरे मन, वचन अथवा कर्म से जाने-अनजाने किसी भी जीव को दुःख पहुंचा हो तो मैं हृदय से क्षमा चाहता हूं। मैं भी उन सभी को क्षमा करता हूं, जिन्होंने मुझे किसी भी प्रकार से दुःख पहुंचाया है।

और अंत में—

गलतियों से जुदा तू भी नहीं,
गलतियों से जुदा मैं भी नहीं।
दोनों इंसान हैं—खुदा तू भी नहीं,
खुदा मैं भी नहीं।

यही स्वीकार जीवन में विनय लाता है, विनय से क्षमा जन्म लेती है और क्षमा से मन का मैल धुलकर आत्मा में शांति का प्रकाश उतरता है।

यही क्षमावाणी का सार है—मनोमालिन्य धोकर मन को निर्मल करना और वैर की भूमि पर मैत्री के बीज बोना।

– डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर

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