
इंदौर | शाबाश इंडिया।
दलाल बाग मैदान में चल रहे विशाल अखिल भारतीय श्रावक संस्कार शिविर में राष्ट्रसंत मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज ने शिविरार्थियों को जीवन में सुख के साथ दुःख, अच्छाई के साथ बुराई और सत्य के साथ संयम को समझने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि संसार में जितने भी ज्ञेय हैं, मनुष्य को उनके बारे में जानना चाहिए। अनेक लोग भगवान को तो जानना चाहते हैं, लेकिन जगत के वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास नहीं करते। सुख के साथ दुःख को और फूल के साथ कांटों को भी जानना जरूरी है, क्योंकि केवल फूल पाने की इच्छा में कांटों की जानकारी न हो तो कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि किसी विषय को जानने में पक्षपात नहीं होना चाहिए। व्यक्ति को अपने संबंध में जितनी जानकारी है, उतनी ही अपने विरोधी या प्रतिकूल परिस्थितियों के संबंध में भी जानकारी रखनी चाहिए। सत्य को केवल सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे प्रज्ञा के माध्यम से समझकर जीवन में उतारना चाहिए। निर्णय शरीर या मन के आवेग से नहीं, बल्कि विवेक और प्रज्ञा से करने की आवश्यकता है।
दोपहर के विशेष सत्र में राष्ट्रसंत ने सैनिकों के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने घर-परिवार को छोड़कर सीमा पर चौबीस घंटे कर्तव्य निभाने वाले सैनिकों का सम्मान भारतीय परंपरा में सर्वोपरि रहा है। उन्होंने कहा कि सैनिक राष्ट्र के लिए अपने जीवन को समर्पित करते हैं, इसलिए साधु-संत भी उनके प्रति मंगलभाव रखते हैं। उन्होंने शिविरार्थियों से प्रतिदिन राष्ट्रकल्याण की भावना भाने का आह्वान किया।
मध्यप्रदेश महासभा के संयोजक विजय धुर्रा ने कहा कि विशेष सत्र राष्ट्र निर्माण में प्रत्येक व्यक्ति के योगदान को समर्पित है। व्यक्ति घर, कारखाने, सरकारी कार्यालय या किसी भी क्षेत्र में रहते हुए राष्ट्र के उत्थान में अपनी भूमिका निभा सकता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण केवल किसी एक वर्ग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की सहभागिता से संभव है।
प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया ने शिविरार्थियों से हर क्षण सावधान और जागरूक रहने की बात कही। उन्होंने कहा कि किस क्षण किसके कल्याण की बात निकल आए, यह पता नहीं होता। शिविर में दिखाई दे रहा संघ बाल ब्रह्मचारी संघ है और उसकी त्याग-तपस्या को अपने जीवन का आदर्श बनाने का प्रयास करना चाहिए।
मुनि सुधासागरजी महाराज ने कर्मों की स्थिति को समझने के लिए राणा प्रताप का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार किसी राजा को अपने शत्रु की गतिविधियों और ताकत की जानकारी होना आवश्यक है, उसी प्रकार मनुष्य को अपने कर्मों की प्रकृति और उनके परिणामों को समझना चाहिए। उन्होंने बताया कि राणा प्रताप ने विपरीत परिस्थितियों में जंगलों में रहकर तैयारी की और बाद में अपना राज्य पुनः प्राप्त किया। जीवन में भी परिस्थितियों और उनके कारणों की पूरी जानकारी रखना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि ‘‘सब कुछ पढ़ो, लेकिन सब कुछ करो मत।’’ सत्य के तीन भेद बताते हुए उन्होंने हेय, उपादेय और उपकारी के विवेक की बात कही। बुरे को जानना आवश्यक है, लेकिन बुरा सोचना आवश्यक नहीं। सत्य के साथ संयम को धारण करना चाहिए। शिविरार्थियों को अपने विवेक और प्रज्ञा से यह निर्णय करना चाहिए कि जो कुछ वे देख या सुन रहे हैं, वह उचित है या अनुचित। निर्णय में कठिनाई हो तो माता-पिता या योग्य मार्गदर्शक से परामर्श लेना चाहिए।
महात्मा गांधी के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि संयम को स्वतंत्रता समझना उचित नहीं है। आंखें बंद करने के बजाय यह समझना जरूरी है कि क्या देखना है और किससे दूर रहना है। जिस कार्य से मां, समाज, गुरु या कानून ने रोका है, उससे बचना ही संयम का हिस्सा है। उन्होंने गांधीजी के ‘‘बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो और बुरा मत सुनो’’ के संदेश को आज भी उपयोगी बताते हुए कहा कि जिस संगति से नुकसान हो, उससे दूर रहना चाहिए और जिससे जीवन का उपकार हो, उसे अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि दुःख से भागकर दीक्षा नहीं ली जाती, बल्कि सुख के कर्मों से भी विरक्ति और आत्मकल्याण की भावना से दीक्षा का मार्ग अपनाया जाता है। मनुष्य को अपने प्रियजनों के प्रति प्रेम रखते हुए भी आसक्ति की ऐसी सीमा नहीं बनानी चाहिए कि उनकी इच्छाएं पूरी न होने पर वे स्वयं को नुकसान पहुंचाने लगें।
उन्होंने कहा कि संसार की 84 लाख योनियों में कर्मभूमि का मनुष्य ही मुनिराज को आहार देने और संयम ग्रहण करने का सौभाग्य प्राप्त कर सकता है। श्रावक संस्कार शिविर में सहभागी होना और दशलक्षण पर्व की आराधना करना भी कर्मभूमि के मनुष्य के लिए विशेष सौभाग्य का अवसर है।
श्रावक संस्कार शिविर में श्रद्धा और उत्साह का विशेष दृश्य उस समय देखने को मिला, जब हजारों शिविरार्थियों की सहभागिता से 16 हजार दीपों से जगमग महाआरती की गई। दीपों की रोशनी से दलाल बाग का वातावरण भक्तिमय हो उठा और शिविरार्थियों ने सामूहिक रूप से धर्म आराधना की।


