
मालेगांव | शाबाश इंडिया।
लेखक: डॉ. अल्पना जैन ‘महाराष्ट्र गौरव’, जिन धर्म रक्षिका एवं समाज सेविका, मालेगांव
‘उत्तम तप धर्म’ जैन दर्शन के दशलक्षण महापर्व का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। तप का सरल अर्थ है—अपने भीतर की अशुद्धियों को दूर करने के लिए स्वयं की साधना। जिस प्रकार सोने को अग्नि में तपाने पर उसकी अशुद्धियां दूर होकर वह कुंदन बन जाता है, उसी प्रकार तप के माध्यम से आत्मा पर चढ़े कर्मरूपी मैल को दूर करने का प्रयास किया जाता है और आत्मा के शुद्ध स्वरूप की अनुभूति का मार्ग प्रशस्त होता है।
‘तप’ शब्द सुनते ही अक्सर हमारे मन में घर-बार छोड़कर जंगल जाने, लंबे समय तक भूखे रहने या कठिन शारीरिक साधना करने की तस्वीर उभरती है। लेकिन जैन दर्शन में उत्तम तप का अर्थ केवल शरीर को कष्ट देना नहीं है, बल्कि अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर संयम प्राप्त करना है। जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं को नियंत्रित कर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ता है, तभी तप सार्थक होता है। ‘उत्तम’ तप नाम, प्रसिद्धि या किसी सांसारिक लालसा के लिए नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, वीतराग भाव और मोक्षमार्ग की ओर बढ़ने की साधना है।
सच्चा तप व्यक्ति के भीतर क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों पर विजय पाने की प्रेरणा देता है। जैन दर्शन में तप को दो मुख्य भागों—बाह्य तप और अंतरंग तप—में विभाजित किया गया है। दोनों के छह-छह भेद हैं और इस प्रकार कुल 12 तप माने गए हैं।
बाह्य तप मुख्य रूप से शरीर और खान-पान के संयम से जुड़ा है। अनशन तप में आत्मशुद्धि के उद्देश्य से निश्चित अवधि तक भोजन का त्याग किया जाता है। इसका लक्ष्य केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि इंद्रियों की चंचलता पर नियंत्रण प्राप्त करना है। अवमौदर्य अथवा ऊनोदर तप में अपनी क्षमता और आवश्यकता से कम भोजन ग्रहण किया जाता है, जिससे शरीर में आलस्य न आए और साधना में मन लगा रहे।
वृत्ति-परिसंख्यान तप में भोजन ग्रहण करने से पहले किसी निश्चित नियम या मर्यादा का संकल्प लिया जाता है। यह व्यक्ति को अपनी इच्छाओं को सीमित करने और संयमित जीवन जीने का अभ्यास कराता है। रस-परित्याग तप में स्वाद और आसक्ति पर नियंत्रण के लिए विभिन्न रसों का पूर्ण या आंशिक त्याग किया जाता है। विविक्त-शय्यासन तप में एकांत एवं शांत स्थान पर रहकर साधना और ध्यान के लिए अनुकूल वातावरण बनाया जाता है। वहीं काय-क्लेश तप में शरीर को अत्यधिक आराम का अभ्यस्त न बनाकर कठिन परिस्थितियों में भी संयम और साधना में स्थिर रहने का अभ्यास किया जाता है।
अंतरंग तप मन और आत्मा की साधना से जुड़ा है। प्रायश्चित तप में जाने-अनजाने में हुई गलतियों को स्वीकार कर उनके सुधार का प्रयास किया जाता है। विनय तप देव, शास्त्र, गुरु, बड़ों और गुणीजन के प्रति मन, वचन और काय से सम्मान एवं विनय का भाव रखना सिखाता है। विनय अहंकार को कम करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
वैयावृत्य तप में साधु-संतों, रोगियों, वृद्धों अथवा धर्ममार्ग पर चलने वाले जीवों की निःस्वार्थ सेवा और सहायता की जाती है। स्वाध्याय तप में पवित्र ग्रंथों का अध्ययन, धर्मचिंतन और आत्मज्ञान की साधना की जाती है। स्वाध्याय व्यक्ति को अपने भीतर झांकने और सही मार्ग को समझने की प्रेरणा देता है।
व्युत्सर्ग तप में शरीर, धन, मकान और अन्य सांसारिक वस्तुओं के प्रति ममत्व एवं आसक्ति को कम करने का अभ्यास किया जाता है। वहीं ध्यान तप में मन की चंचलता को रोककर एकाग्रता प्राप्त करने और आत्मा के शुद्ध स्वरूप में लीन होने का प्रयास किया जाता है। यह आत्मिक साधना की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण तप है।
उत्तम तप धर्म हमें सिखाता है कि इच्छाओं के पीछे निरंतर भागना व्यक्ति को आसक्ति में बांधता है, जबकि इच्छाओं पर संयम प्राप्त करना आत्मिक स्वतंत्रता की ओर ले जाता है। जब हम अपनी शक्ति और परिस्थिति के अनुसार इन 12 तपों की भावना को जीवन में छोटे-छोटे संकल्पों के रूप में अपनाते हैं, तो जीवन अधिक संयमित, शांत और निर्मल बन सकता है।
दशलक्षण महापर्व के इस पावन अवसर पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण रखने का निरंतर प्रयास करेंगे तथा तप की भावना को जीवन में उतारेंगे। महाभाग्य से प्राप्त मनुष्य पर्याय को तप रूपी अग्नि में तपाकर कुंदन बनाने का प्रयास ही उत्तम तप धर्म की सार्थकता है।
इच्छाओं के पीछे भागना तो केवल संसार बढ़ाना है,
तप की पावन अग्नि में कर्मों के मैल को जलाना है।
कठिन नहीं है राह मुक्ति की, बस एक कदम बढ़ाना है,
12 तपों को जीवन में लाकर, प्रभु-सा रूप पाना है।
उत्तम तप धर्म की जय।


