
अंबाह | शाबाश इंडिया।
दशलक्षण पर्व के दूसरे दिन गुरुवार को उत्तम मार्दव धर्म की आराधना की गई। परम पूज्य गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री संगममति माताजी ससंघ के पावन सानिध्य में श्रद्धालुओं ने उत्तम मार्दव धर्म का मर्म समझते हुए अपने भीतर के अहंकार को पहचानने और उसे कम करने का संकल्प लिया। श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर, परेड में पूजन एवं प्रवचन हुए। वहीं बीती रात जैन बगीची में चेयर रेस का आयोजन किया गया, जिसमें बच्चों और समाजजनों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
प्रवचन में माताजी ने उत्तम मार्दव धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि मनुष्य के भीतर सबसे बड़ा विकार अहंकार है। धन मिला तो धन का अभिमान, सुंदरता मिली तो रूप का अभिमान, ज्ञान मिला तो विद्या का अभिमान और पद मिला तो पद का अभिमान पैदा हो जाता है। मनुष्य इन चीजों को अपना समझकर दूसरों को छोटा समझने लगता है, जबकि जीवन की सच्चाई यह है कि न धन स्थायी है, न पद और न ही यह शरीर।
उन्होंने कहा कि जिस शरीर पर मनुष्य को इतना अभिमान है, वही शरीर एक दिन मिट्टी में मिल जाना है। जिस धन के लिए जीवनभर दौड़ते हैं, वह भी यहीं छूट जाना है। ऐसे में अहंकार किस बात का? जैन दर्शन मनुष्य को बाहरी पहचान से ऊपर उठकर अपनी आत्मा को पहचानने की प्रेरणा देता है। जब मनुष्य समझता है कि वास्तविक पहचान शरीर, धन या पद नहीं, बल्कि शुद्ध चेतन आत्मा है, तब उसके भीतर से अहंकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
माताजी ने कहा कि पेड़ पर फल आते हैं तो उसकी डालियां झुक जाती हैं। इसी तरह जीवन में ज्ञान, धन और सम्मान बढ़े तो मनुष्य को और अधिक विनम्र होना चाहिए। जो व्यक्ति उपलब्धियां मिलने के बाद भी झुकना जानता है, वही वास्तव में बड़ा है।
उन्होंने कहा कि भगवान के सामने सिर झुका देना आसान है, लेकिन अपने से छोटे व्यक्ति के सामने विनम्र रहना कठिन है। मंदिर में पूजा करने के बाद यदि घर में माता-पिता, परिवार या किसी कर्मचारी से अहंकारपूर्ण व्यवहार किया तो धर्म अभी जीवन में नहीं उतरा है। उत्तम मार्दव धर्म की असली परीक्षा मंदिर में नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार में होती है।
माताजी ने श्रद्धालुओं से कहा कि दशलक्षण पर्व पर केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहें, बल्कि अपने भीतर से एक-एक विकार कम करने का संकल्प लें। किसी को छोटा समझने की आदत छोड़ें, गलती होने पर उसे स्वीकार करें और दूसरों की सफलता देखकर ईर्ष्या के बजाय प्रसन्न होना सीखें। उन्होंने कहा कि विनम्रता कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल की पहचान है।
दशलक्षण पर्व के दौरान धार्मिक आयोजनों के साथ बच्चों एवं समाजजनों के लिए विभिन्न कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं। जैन बगीची में हुई चेयर रेस में प्रतिभागियों ने उत्साह के साथ भाग लिया। बच्चों की सक्रिय भागीदारी से आयोजन का माहौल उत्सवमय रहा। वहीं परेड स्थित श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में पूजन एवं प्रवचन में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
माताजी के संदेश ने दशलक्षण पर्व के दूसरे दिन को आत्मचिंतन का अवसर बना दिया। ‘मैं’ जितना छोटा होगा, मनुष्य उतना ही विनम्र बनेगा और अहंकार जितना कम होगा, आत्मचिंतन तथा आत्मशुद्धि का मार्ग उतना ही सहज होगा।


