Friday, September 18, 2026

‘णमोकार’ मंत्र की साधना से अहंकार का हिमालय भी पिघल सकता है : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी

सोनकच्छ | शाबाश इंडिया।

पर्वों के पर्वराज दशलक्षण महापर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म की आराधना के अवसर पर पुष्पगिरी तीर्थ सोनकच्छ में धर्म और साधना का वातावरण बना हुआ है। परम पूज्य पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के सानिध्य में व्रत चक्रवर्ती पट्ट विभूषण अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पियूष सागरजी महाराज ससंघ वर्षायोग के लिए विराजमान हैं। उनके सानिध्य में दशलक्षण महापर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है।

दशलक्षण महापर्व के दूसरे दिन प्रातःकाल गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने उत्तम मार्दव धर्म की व्याख्या करते हुए अहंकार त्यागने का संदेश दिया। आचार्यश्री ने कहा, “णमोकार मंत्र का उपासक अहंकार कैसे कर सकता है? क्योंकि जहां णमोकार है, वहां अहंकार नहीं और जहां अहम है, वहां अर्हम् नहीं।”

उन्होंने कहा कि णमोकार और अहंकार दोनों विपरीत धाराएं हैं। णमोकार पूरब है तो अहंकार पश्चिम और णमोकार उत्तर है तो अहंकार दक्षिण। दोनों एक साथ नहीं रह सकते। मनुष्य के जीवन में विनय और नम्रता होगी तो अहंकार स्वतः दूर होता जाएगा।

आचार्यश्री ने बताया कि णमोकार मंत्र में पांच बार ‘णमो’ शब्द आता है। इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक संदेश है। अहंकार मनुष्य के भीतर जटिल और सूक्ष्म रूप में रहता है। बार-बार नमन करने की भावना से अहंकार को चोट पहुंचती है और विनय का विकास होता है। उन्होंने कहा, “णमोकार मंत्र की फुहार से अहंकार का हिमालय भी पिघल सकता है। अहंकार का पिघलना, गलना और मिटना ही उत्तम मार्दव धर्म है।”

आचार्यश्री ने अहंकार को आध्यात्मिक विकास में बड़ी बाधा बताते हुए कहा कि व्यक्ति कितना भी ज्ञानवान, धनवान या प्रतिष्ठित क्यों न हो, यदि उसके भीतर अहंकार है तो उसकी विनम्रता और आत्मिक सुंदरता अधूरी है। सच्चा बड़प्पन दूसरों के सामने स्वयं को बड़ा साबित करने में नहीं, बल्कि विनम्र बने रहने में है।

उन्होंने कहा कि अहंकार से मुक्ति का एक सरल उपाय णमोकार मंत्र का अंतःकरण से जाप करना और अपनों से अनावश्यक अपेक्षाएं न रखना है। अपेक्षाएं कम होंगी तो शिकायतें कम होंगी और मन में शांति एवं प्रसन्नता बढ़ेगी। जब मनुष्य नमन करना सीख जाता है, तब उसके चेहरे पर सहजता और आचरण में निखार दिखाई देने लगता है। विनय व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है, जबकि अहंकार उसे भीतर से खोखला करता है।

आचार्यश्री के प्रवचन से उपस्थित गुरु भक्तों ने उत्तम मार्दव धर्म के स्वरूप को समझते हुए आत्मचिंतन और अहंकार त्याग का संकल्प लिया। पूरे परिसर में णमोकार मंत्र के जाप और धार्मिक वातावरण से श्रद्धा की अनुभूति होती रही।

जानकारी: नरेंद्र अजमेरा एवं पियूष कासलीवाल, प्रचार-प्रसार संयोजक, औरंगाबाद

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