
इंदौर | शाबाश इंडिया।
संतों के प्रवचन सुनना सहज है, सुनकर उसे आचरण में उतारना कठिन और गृहस्थ जीवन में रहते हुए साधु-सा अनुशासित जीवन जीना तो किसी कल्पना से कम नहीं लगता। लेकिन यही कल्पना इंदौर की धरती पर साकार होने जा रही है।
दसलक्षण पर्व के पावन अवसर पर 16 से 25 सितंबर तक दलाल बाग, छत्रपति नगर में मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में विश्वस्तरीय श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन किया जा रहा है। जयपुर के दिनेश गंगवाल के संयोजन में होने वाले इस शिविर में देश-विदेश से 6 हजार से अधिक शिविरार्थियों ने पंजीयन कराया है।
यह सामान्य धार्मिक शिविर नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए संयम, अनुशासन और साधना का अभ्यास कराने वाला एक अनूठा प्रयोग है। शिविरार्थी 10 दिनों तक घर-परिवार, मोबाइल, बिस्तर और सांसारिक सुविधाओं से दूरी बनाकर साधक के रूप में जीवन व्यतीत करेंगे। वे इंद्रियों पर नियंत्रण, त्याग और संयम के साथ दसलक्षण धर्म की आराधना करेंगे।
इस संस्कार शिविर की यात्रा वर्ष 1993 में उत्तर प्रदेश के ललितपुर से मात्र 125 शिविरार्थियों के साथ शुरू हुई थी। समय के साथ यह संख्या बढ़ती गई और आज यह आयोजन 6 हजार से अधिक शिविरार्थियों तक पहुंच चुका है। इसकी खास विशेषता यह है कि सामान्य श्रावक से लेकर IAS अधिकारी, डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, उद्योगपति, व्यापारी और उच्च शिक्षित वर्ग के लोग भी एक ही वेशभूषा में समान रूप से साधना करते हैं। यहां सामाजिक या आर्थिक हैसियत का कोई भेद नहीं रहता और सभी एक पंक्ति में मौनपूर्वक एक समय आहार करते हैं।
मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज का संदेश ‘ढोंग का नहीं, ढंग का धर्म’ इस शिविर की मूल भावना को दर्शाता है। शिविर में पत्तेदार सब्जियों और जमीकंद के त्याग के साथ-साथ केश-तेल, दर्पण, कंघा और सौंदर्य प्रसाधनों से दूरी, उपवास तथा संयम जैसी साधनाओं का अभ्यास कराया जाता है। इसका उद्देश्य यह समझाना है कि भौतिक सुविधाओं से दूर रहकर भी अनुशासित और आनंदपूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
आयोजकों के अनुसार, इस शिविर में संस्कारित हुए अनेक शिविरार्थियों ने आगे चलकर सांसारिक वैभव का त्याग कर जैनेश्वरी मुनि दीक्षा धारण की है। इस दृष्टि से यह आयोजन केवल संस्कार शिविर ही नहीं, बल्कि वैराग्य की प्रारंभिक पाठशाला के रूप में भी देखा जाता है।
सकल दिगंबर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में आयोजित शिविर की एक विशेष परंपरा यह भी है कि नगर के जैन परिवार शिविरार्थियों को अपने घर अतिथि के रूप में आमंत्रित कर शुद्ध, सात्विक और मर्यादित आहार कराते हैं। कौन शिविरार्थी किस परिवार के घर जाएगा, इसकी व्यवस्था भी पहले से सुनियोजित की जाती है। इस परंपरा के माध्यम से अहिंसा, वात्सल्य और आत्मीयता का भाव देखने को मिलता है।
इस विशाल आयोजन के लिए इस वर्ष नगर के महादानी एवं सेठ चामुंडराय की उपाधि से अलंकृत श्री आकाश-आलोक जैन (कोयला परिवार) ने आयोजन का संपूर्ण व्यय वहन करने और व्यवस्थाओं में सहयोग का सौभाग्य प्राप्त किया है। उनका यह समर्पण समाज की ओर से अभिनंदनीय बताया गया है।
‘मिनी बुंदेलखंड’ के रूप में प्रसिद्ध छत्रपति नगर के दलाल बाग में होने वाला यह श्रावक संस्कार शिविर इंदौर के धार्मिक आयोजनों में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ने जा रहा है। यह शिविर इस संदेश को भी रेखांकित करेगा कि धर्म केवल मंदिर में पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं, बल्कि अनुशासन, संयम, त्याग और सदाचार के साथ जीवन जीने की कला भी है।
लेखक: डॉ. जैनेंद्र जैन, कार्याध्यक्ष, छत्रपति नगर दिगंबर जैन समाज एवं जिनालय ट्रस्ट


