
घुवारा | शाबाश इंडिया।
श्रमण संस्कृति में संयम, साधना और त्याग की परंपरा को अपने जीवन में दृढ़ता से आत्मसात करने वाले मुनि श्री मंगलानंद सागर महाराज की विशिष्ट श्रमण चर्या इन दिनों श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। उनके जीवन में दिखाई देने वाला संयम और आहार-विहार का कठोर अनुशासन उन्हें वर्तमान समय में श्रमण चर्या के प्रेरणादायी प्रतिमान के रूप में प्रस्तुत करता है।

मीडिया प्रभारी भरत सेठ घुवारा के अनुसार श्रमण संस्कृति में पंचम काल की विपरीत परिस्थितियों को आधार बनाकर चर्या में शिथिलता को उचित ठहराने की प्रवृत्ति पर चिंतन आवश्यक है। ऋतुजन्य विषमताओं से बचने के लिए आधुनिक भौतिक संसाधनों का उपयोग आज सामान्य सामाजिक स्वीकृति प्राप्त कर चुका है, हालांकि कुछ संत-संघ आज भी इनसे दूर रहकर कठोर साधना की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के साधक शिष्य मुनि श्री सरल सागर जी महाराज ने भी अपने जीवन में ऐसे संसाधनों को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से विभिन्न कुरीतियों एवं शिथिलताओं पर आगम आधारित समीक्षाएं प्रस्तुत कर समाज को सचेत किया और अपनी चर्या में दृढ़ता बनाए रखी। मौन साधक मुनि श्री सरल सागर जी महाराज द्वारा 11 दीक्षाएं प्रदान की गई हैं। उनके आज्ञानुवर्ती शिष्य मुनि श्री मंगलानंद सागर महाराज भी इसी साधना परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
दिल्ली जैसे महानगर में रहते हुए मुनि श्री मंगलानंद सागर महाराज ने 17 वर्ष की आयु में द्वितीय प्रतिमा के व्रत अंगीकार कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। इसके बाद उन्होंने सेंट्रल बैंक में सेवा करते हुए गृहस्थ धर्म का पालन किया। उनके सुपुत्र राजेश जी औषधियों के व्यापार के साथ गृहस्थ धर्म का निर्वहन करते हुए सप्तम प्रतिमा धारण कर दीक्षा की तैयारी में हैं। दूसरे सुपुत्र अजय जी भी धर्माचरणपूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं। उनकी सुपुत्रियां श्रीमती रीना पंकज जैन ऋषभ विहार, दिल्ली तथा श्रीमती डिंपल जैन लक्ष्मी नगर, दिल्ली में निवासरत हैं।
अचंभित करने वाली आहारचर्या
मुनि श्री मंगलानंद सागर महाराज की आहारचर्या भी अत्यंत संयमित एवं विशिष्ट है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वे आहार में नमक, शक्कर, घी, तेल, दूध और दही सहित अनेक पदार्थों का त्याग कर केवल छाछ ग्रहण करते हैं। विभिन्न अन्नों में दाल, चावल, चना, मटर और मक्का आदि का त्याग कर केवल गेहूं का उपयोग करते हैं। उबले हुए छुहारे के अतिरिक्त अन्य ड्राई फ्रूट्स तथा फलों के रस का भी त्याग किया हुआ है।
उनकी आहार मात्रा भी अत्यंत सीमित बताई जाती है। वे लगभग 6-7 अंजलि जल, 2 अंजलि छाछ, 2 अंजलि मुनक्के का जल तथा मट्ठे में भीगी रोटी ही आहार में लेते हैं। जिन श्रावकों द्वारा पड़गाहन किया जाता है, उन्हीं से आहार ग्रहण करते हैं और किसी श्रावक से दूसरी बार सामग्री नहीं लेते। यदि चार श्रावक पड़गाहन करते हैं तो प्रत्येक से निर्धारित मात्रा में ही आहार ग्रहण करते हैं।
उनकी दिनचर्या भी कठोर अनुशासन से बंधी हुई है। वे देव दर्शन, प्रवचन, आहारचर्या एवं नीहार के लिए ही कक्ष से बाहर आते हैं। शेष समय एक ही तख्त पर बिना चटाई के स्वाध्याय एवं साधना में व्यतीत करते हैं। विषम परिस्थितियों के बीच भी इस प्रकार की आत्मलीनता, साधना एवं संयम श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणादायी और अनुकरणीय बना हुआ है।
श्रद्धालुओं से आह्वान किया गया है कि ऐसी विशिष्ट श्रमण चर्या वाले संत के दर्शन एवं मांगलिक प्रवचन का लाभ लेने के लिए प्रागैतिहासिक अतिशय क्षेत्र नवागढ़, जिला ललितपुर पधारें।
विश्व प्रसिद्ध जैन तीर्थ नवागढ़ अतिशय क्षेत्र सातवीं सदी के भोयरा मंदिर तथा मनोकामना पूर्ण करने वाले अतिशयकारी अरहनाथ स्वामी के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यहां फाईटोन पहाड़ी, जैन पहाड़ी और बगाज पहाड़ी पर स्थित शैलाश्रय भी ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाते हैं, जहां गुप्तकाल से लेकर वर्तमान समय तक संतों की साधना की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
प्रत्येक रविवार दोपहर 2 बजे से मुनि श्री मंगलानंद सागर महाराज के मांगलिक प्रवचन आयोजित होते हैं, जिनमें बुंदेलखंड क्षेत्र के विभिन्न इलाकों से बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त करते हैं।
मीडिया प्रभारी: भरत सेठ घुवारा


