
उदयपुर | शाबाश इंडिया।
कॉर्पोरेट जगत की व्यस्त और भागदौड़ भरी दिनचर्या के बीच भक्ति, कला और सेवा का अनूठा उदाहरण पेश कर रहे हैं विरंची व्यास। एमबीए करने के बाद एक निजी कंपनी में कार्यरत विरंची पिछले सात वर्षों से लड्डू गोपाल के विग्रहों का निःशुल्क श्रृंगार, रंग-रोगन एवं मरम्मत कर रहे हैं। इस वर्ष जन्माष्टमी के अवसर पर उन्होंने 104 लड्डू गोपाल विग्रहों को आकर्षक एवं मनमोहक स्वरूप प्रदान किया।
बचपन से ही रंगों और चित्रकला के प्रति विशेष रुचि रखने वाले विरंची के लिए यह सेवा महज कलात्मक कार्य नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और कान्हा जी के प्रति समर्पण का माध्यम बन गई है। दिनभर निजी कंपनी में कार्य करने के बाद वे अपना समय विग्रहों के श्रृंगार, सज्जा और आवश्यक मरम्मत में लगाते हैं।
विरंची बताते हैं कि इस सेवा की शुरुआत उनके अपने घर में विराजित कान्हा जी के श्रृंगार से हुई। धीरे-धीरे रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों ने भी उनसे अपने घरों में विराजित लड्डू गोपाल का श्रृंगार करवाना शुरू कर दिया। समय के साथ कई विग्रहों की आंखें धुंधली अथवा खराब हो जाती हैं, रंग उतर जाता है या हाथ-पैर जैसे छोटे हिस्से क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। श्रद्धालुओं की भावनाओं को समझते हुए उन्होंने ऐसे विग्रहों को पुनः सुंदर और पूजनीय स्वरूप प्रदान करने का संकल्प लिया।
सात वर्षों की इस निरंतर सेवा यात्रा में विरंची अब तक 300 से अधिक लड्डू गोपाल विग्रहों का कायाकल्प कर चुके हैं। वे विग्रहों की मरम्मत के साथ आंखों की आकर्षक रचना, रंग संयोजन, वस्त्रों के अनुरूप श्रृंगार और अलंकरण का कार्य बेहद सावधानी एवं श्रद्धा से करते हैं। खास बात यह है कि इस सेवा के लिए वे किसी भी श्रद्धालु से कोई शुल्क नहीं लेते।
इस जन्माष्टमी पर 104 विग्रहों का श्रृंगार उनके लिए विशेष उपलब्धि रहा। अब इस सेवा कार्य में उनके परिवारजन और मित्र भी सहयोग करने लगे हैं। विरंची का कहना है कि रंगों का हर स्पर्श उन्हें कान्हा जी के और करीब ले जाता है तथा इस सेवा से मिलने वाला सुकून किसी भी पारिश्रमिक से कहीं अधिक है।
रिपोर्ट: राकेश शर्मा ‘राजदीप’


