
घुवारा | शाबाश इंडिया।
प्रतिष्ठा शिरोमणि ग्रंथ कार्यशाला में परम पूज्य गणिनी आर्यिका श्री 105 विन्धश्री माताजी के सानिध्य में भगवान के निष्क्रमण कल्याणक एवं केवलज्ञान कल्याणक की प्रतिष्ठा विधियों पर विशेष मंथन किया गया। कार्यशाला में देशभर से आए विद्वानों ने हस्तलिखित ग्रंथों, प्रकाशित प्रतिष्ठा ग्रंथों एवं पुराण साहित्य के आधार पर वर्तमान में प्रचलित प्रतिष्ठा विधियों की विभिन्न विसंगतियों और सुधार की आवश्यकता पर विचार-विमर्श किया।
प्रातःकालीन सत्र में तप कल्याणक, जिसे ग्रंथों में निष्क्रमण कल्याणक कहा गया है, विषय पर हस्तलिखित ग्रंथों के आलोक में चर्चा हुई। इस दौरान वर्तमान में प्रचलित प्रतिष्ठा विधि एवं मंचीय विधि में दिखाई देने वाली अनेक भिन्नताओं पर विद्वानों ने अपने विचार रखे। चर्चा में कहा गया कि वर्तमान प्रतिष्ठा ग्रंथों में प्राचीन ग्रंथों और आचार्यों के कथनों के अनुरूप आवश्यक सुधार किए जाने की आवश्यकता है।
कार्यशाला में कुछ प्रचलित व्याख्याओं को लेकर भी विद्वानों ने ग्रंथों के आधार पर चर्चा की। इनमें ब्राह्मी-सुंदरी का ब्रह्मचर्य ग्रहण करना, तीर्थंकर माता का रुदन तथा तीर्थंकर पिता के वैराग्य भाव आदि विषय शामिल रहे।
प्रातःकालीन सत्र के समापन पर पूज्य गुरु मां विन्धश्री माताजी ने पूरे सत्र की चर्चा की समीक्षा की। उन्होंने कार्यशाला के आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं देश के विभिन्न स्थानों पर आयोजित होनी चाहिए, ताकि प्राचीन प्रतिष्ठा विधियों एवं ग्रंथ परंपरा का गहन अध्ययन और संरक्षण हो सके।
दोपहर के सत्र में केवलज्ञान कल्याणक विधि पर 22 हस्तलिखित ग्रंथों, 20 प्रकाशित प्रतिष्ठा ग्रंथों एवं विभिन्न पुराण ग्रंथों के आलोक में विस्तृत चर्चा हुई। विद्वानों ने वर्तमान में प्रचलित अनेक विधियों और उनमें आए परिवर्तनों पर गहन मंथन किया।
इस दौरान तिलक दान विधि पर भी विशेष चर्चा हुई। विद्वानों के अनुसार, ग्रंथों में मंत्रों के माध्यम से भगवान की नाभि में तिलक करने की विधि का उल्लेख मिलता है, जबकि वर्तमान में कई स्थानों पर प्रतिष्ठाचार्य द्वारा स्वयं तिलक करवाने की परंपरा दिखाई देती है। इसे लेकर ग्रंथों में वर्णित मूल विधि के अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
केवलज्ञान कल्याणक के समय पालन की जाने वाली सावधानियों, शुद्धि, जप एवं आराधना आदि विषयों पर भी विस्तार से विचार-विमर्श हुआ। विद्वानों ने कहा कि इन धार्मिक प्रक्रियाओं का उद्देश्य प्रतिमाओं में अतिशय की अनुभूति एवं आध्यात्मिक वातावरण की निर्मिति से जुड़ा है, लेकिन वर्तमान में मंचीय कार्यक्रमों के कारण कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं अपेक्षित रूप से नहीं हो पातीं। इन विषयों पर भी गंभीर चिंतन किया गया।
सत्र के समापन अवसर पर आगामी प्रतिष्ठा शिरोमणि कार्यशाला की पत्रिका का विमोचन किया गया। यह कार्यशाला परम पूज्य पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के पावन सानिध्य में ऋषभ विहार, दिल्ली में 7, 8 एवं 9 अक्टूबर को आयोजित होगी। इसके साथ ही दश लक्षण पर्व के अवसर पर गुरु मां के सानिध्य में गिरार जी में आयोजित होने वाले श्रावक संस्कार शिविर की पत्रिका का भी विमोचन किया गया।
आयोजन में अनेक विद्वानों, संगीतकारों, मंच कलाकारों एवं पत्रकारों ने उपस्थित होकर कार्यशाला की गरिमा बढ़ाई। कार्यक्रम का सीधा प्रसारण दिव्य ध्वनि यूट्यूब चैनल के माध्यम से किया जा रहा है। संगीतकार मयंक जैन बड़ागांव द्वारा प्रतिदिन रात्रि में संगीतमयी आरती के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्तिरस से जोड़ा जा रहा है।
कार्यक्रम में अध्यक्ष डॉ. विजय जैन, नरेंद्र कुमार, चंद्र कुमार, राकेश कुमार (लल्लू), संतोष कुमार (संतु), प्रकाश चंद (पप्पू), रजनेश (मंटू), विक्की सिंघई, रानू सेठ, सोनू सिंघई, कीर्ति जैन, रवि सिंघई, राही सिंघई, रीतेश सिंघई, अमर कपासिया, सिंघई अवशेष जैन, सौरभ जैन, सेठ विकास कुमार एवं सेठ दीपू कारीटोरन सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।
मीडिया प्रभारी: भरत सेठ घुवारा


