
सीकर | शाबाश इंडिया।
आचार्य श्री धर्मसागर जी की समाधि स्थली एवं उनकी शिष्या आर्यिका श्री शांतिमति जी की जन्मभूमि धर्मनगरी सीकर में आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ का 58वें वर्षायोग के लिए भव्य मंगल प्रवेश हुआ। 36 साधुओं (37 पिच्छी) के साथ हुए इस ऐतिहासिक प्रवेश पर समाज ने मंगल आरती, जयघोष एवं श्रद्धाभाव से आचार्य संघ का स्वागत किया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने कहा कि राग, द्वेष और मोह आत्मा पर लगे सबसे बड़े रोग हैं। इन्हीं के कारण जीव दुःखी रहता है। समता और साम्यभाव ही जीवन का सबसे बड़ा धन है। उन्होंने कहा कि चिकित्सालय शरीर के रोगों का उपचार करते हैं और विद्यालय लौकिक शिक्षा देते हैं, किंतु जन्म-मरण के रोग से मुक्ति का मार्ग केवल धर्म और आत्मज्ञान से ही संभव है। आचार्य संघ इसी आत्मिक चिकित्सा का संदेश लेकर समाज के बीच आया है।
उन्होंने कहा कि सीकर उनके दीक्षागुरु आचार्य श्री धर्मसागर जी की समाधि भूमि है। आचार्य धर्मसागर जी का संपूर्ण जीवन समता, संयम और साधना का अनुपम उदाहरण रहा। समाज को उनके आदर्शों से प्रेरणा लेकर साधु-संतों के मार्गदर्शन में अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।
धर्मसभा में आचार्य श्री के मंचासीन होने के पश्चात चित्र अनावरण, दीप प्रज्ज्वलन एवं मंगलाचरण हुआ। इसके बाद राजकुमार-चंदा देवी भरतिया परिवार को चरण प्रक्षालन, ऋषभ एवं श्रीमती बबीता सेठी को जिनवाणी भेंट तथा पूरणमल-अजीत-आशीष जयपुरिया परिवार को महाआरती का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
समाज के पदाधिकारियों ने बताया कि आचार्य श्री के साथ मुनि, आर्यिका, ऐलक, क्षुल्लक एवं क्षुल्लिका सहित कुल 36 साधु-साध्वियों (37 पिच्छी) का संघ वर्षायोग के लिए सीकर पहुँचा है।
सीकर दिगम्बर जैन परम्परा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक नगरी है। यह आचार्य श्री धर्मसागर जी, आचार्य श्री विवेकसागर जी एवं आर्यिका श्री विद्यामति सहित अनेक संतों की समाधि स्थली रही है। इसी भूमि से अनेक श्रद्धालुओं ने संयम मार्ग अपनाकर दीक्षा ग्रहण की है। आचार्य श्री शिवसागर जी ने भी वर्ष 1961 में सीकर में चातुर्मास के दौरान आचार्य श्री अजित सागर जी सहित अनेक मुनि एवं आर्यिकाओं को दीक्षा प्रदान की थी।
आचार्य संघ के मंगल प्रवेश से संपूर्ण सीकर नगर धर्ममय वातावरण में सराबोर हो उठा। श्रद्धालुओं ने वर्षायोग के दौरान नियमित रूप से प्रवचन, स्वाध्याय एवं धार्मिक आयोजनों में सहभागी बनने का संकल्प लिया।


