Tuesday, July 7, 2026

आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज सहित मुनि एवं आर्यिकाओं ने किया केशलोचन, श्रद्धालुओं ने की तप साधना की अनुमोदना

मंढा सुरेरा (सीकर) | शाबाश इंडिया।

प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की मूल बालब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का 36 साधुओं सहित (37 पिच्छी संघ) सीकर स्थित दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज की समाधि स्थली के दर्शन एवं वंदना हेतु मंगल विहार चल रहा है।

इसी क्रम में रविवार को आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष पंचमी, 5 जुलाई 2026 को मंढा सुरेरा, जिला सीकर में प्रवास के दौरान आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज, मुनि श्री हितेंद्र सागर जी महाराज, आर्यिका श्री दर्शना मति माताजी एवं आर्यिका श्री निर्मोहमति माताजी ने श्रद्धालुओं की उपस्थिति में केशलोचन किया।

संघ की आर्यिका श्री महायशमति माताजी ने केशलोचन की धार्मिक प्रक्रिया के संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि प्रत्येक दिगंबर साधु के लिए दो से चार माह की अवधि के भीतर केशलोचन करना आवश्यक होता है। केशलोचन दिगंबर साधु के मूल गुणों में शामिल है। इसके माध्यम से शरीर के प्रति राग और मोह का त्याग किया जाता है।

उन्होंने बताया कि जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है। केशलोचन की प्रक्रिया में केवल राख का उपयोग किया जाता है। बालों को हाथों से इसलिए उखाड़ा जाता है, क्योंकि कटिंग या अन्य साधनों के उपयोग में अतिरिक्त द्रव्य और हिंसा की संभावना रहती है। जैन साधु अहिंसा के महाव्रती होते हैं, इसलिए वे स्वयं अपने हाथों से केशलोचन करते हैं।

आर्यिका श्री ने बताया कि जैन साधु अपरिग्रही जीवन जीते हैं। बाल सौंदर्य और आकर्षण का प्रतीक माने जाते हैं, इसलिए केशलोचन के माध्यम से शरीर के प्रति ममत्व और आकर्षण को दूर करने का भाव प्रकट किया जाता है। इस प्रक्रिया में साधु तप, संयम और धैर्य के साथ धर्म की प्रभावना करते हैं।

उन्होंने बताया कि जिस दिन साधु केशलोचन करते हैं, उस दिन उपवास रखते हैं। श्रद्धालुओं द्वारा केशलोचन की अनुमोदना करने से पुण्य लाभ और कर्मों की निर्जरा होती है।

इस अवसर पर बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे। अनेक महिलाओं ने वैराग्यपूर्ण भजनों के माध्यम से केशलोचन की तप साधना की अनुमोदना की।

रिपोर्ट: डॉ. राजेश पंचोलिया, इंदौर

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