आवा | शाबाश इंडिया।

कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे विषयों पर विचार व्यक्त करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि भारत को समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाने के लिए पुरातन पद्धतियों की ओर लौटना होगा। युवा पीढ़ी को केवल नौकरी की तलाश करने के बजाय उत्पादन और स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
आचार्यश्री ने कहा कि हथकरघा और कृषि क्षेत्र में विकास की अपार संभावनाएं हैं। भारतीय बीजों के माध्यम से रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले अनाजों के उत्पादन पर ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने विदेशी बीजों के बढ़ते उपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय परंपरागत कृषि पद्धतियां स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए अधिक उपयोगी हैं।
एक दोहे के माध्यम से आचार्यश्री ने गेहूं की तुलना में बाजरे को अधिक गुणवान बताते हुए कहा कि बाजरा गुरु है। उन्होंने कहा कि देश में परिवर्तन की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन इसे पूर्ण रूप से स्थापित होने में समय लगेगा। उन्होंने संन्यासी और न्यासी दोनों के लिए संतुलित आहार को आवश्यक बताया।
आचार्यश्री ने कहा कि विदेशी शिक्षा और विदेशी भाषा ने भारतीय संस्कृति एवं मूल्यों को प्रभावित किया है। अपनी संस्कृति, परंपराओं और स्वदेशी संसाधनों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
इसी क्रम में ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ शिष्य निर्यापक श्रमण योगसागर जी महाराज ने कस्बे में संचालित विद्याशीष हथकरघा प्रशिक्षण एवं उत्पादन केंद्र का अवलोकन किया। ज्ञात हो कि आचार्य विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से भारत की संस्कृति के परिचायक और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत धुरी रहे हथकरघा उद्योग को देश के विभिन्न स्थानों पर बढ़ावा दिया जा रहा है।
हथकरघा उद्योग के माध्यम से ग्रामीण युवाओं को गांव में ही रोजगार मिल रहा है और वे अपनी कला से उत्कृष्ट उत्पाद तैयार कर रहे हैं। आचार्य विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से देशभर में हजारों युवाओं को हथकरघा के माध्यम से रोजगार के अवसर प्राप्त हुए हैं। कई स्थानों पर जेलों में भी प्रशिक्षण देकर कैदियों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।
आचार्य विद्यासागर जी महाराज एवं मुनि श्री सुधासागर जी महाराज के आशीर्वाद से आवा कस्बे में भी नौ वर्ष पूर्व विद्याशीष हथकरघा प्रशिक्षण एवं उत्पादन केंद्र की शुरुआत की गई थी। यहां कई युवक-युवतियों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है।
विद्याशीष हथकरघा के चेयरमैन आशीष जैन शास्त्री एवं रोहित जैन ने बताया कि युवा बुनकर पारस सैनी, सोनू मीणा, दुर्गाशंकर गुर्जर सहित कई युवा अपनी कला के माध्यम से साड़ी, टॉवेल, बेडशीट सहित विभिन्न उत्कृष्ट उत्पाद तैयार कर रहे हैं। बेहतर उत्पाद निर्माण के लिए इन युवा बुनकरों को जिला एवं राज्य स्तर पर सरकार द्वारा पुरस्कार देकर प्रोत्साहित भी किया गया है।
मुनिश्री ने अपने प्रवचनों में शुद्ध हस्तनिर्मित वस्त्रों के महत्व को बताते हुए कहा कि प्राचीन समय में ये भारतीय अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार थे। हथकरघा जैसे लघु उद्योग गांवों से पलायन रोकने और लोगों को स्वावलंबी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि आचार्यश्री की प्रेरणा से कई स्थानों पर गोशालाओं सहित जीवदया के प्रकल्प भी संचालित हो रहे हैं।
धर्मसभा में चांदमल जी धानोत्या, ओमप्रकाश ठग, चंदू जी हरसौरा, कमलेश हरसौरा, नोरत जी ठग, सुरेश सामरिया जी सहित बड़ी संख्या में श्रावक उपस्थित रहे।


