
डॉ. विजय गर्ग
किसी भी परिवार की नींव केवल आर्थिक आय पर नहीं, बल्कि उस अथक श्रम पर भी टिकी होती है जो घर के भीतर प्रतिदिन निस्वार्थ भाव से किया जाता है। भोजन बनाना, बच्चों का पालन-पोषण, बुजुर्गों की देखभाल, घर की साफ-सफाई, परिवार के प्रत्येक सदस्य की आवश्यकताओं का ध्यान रखना और घर के वातावरण को व्यवस्थित बनाए रखना—ये सभी कार्य समाज और अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। फिर भी इन कार्यों को अक्सर “कर्तव्य” मान लिया जाता है, “काम” नहीं। यही कारण है कि घरेलू श्रम करने वाली करोड़ों महिलाओं के योगदान को वह सम्मान और पहचान नहीं मिल पाती, जिसकी वे वास्तविक हकदार हैं।
भारत में अधिकांश महिलाएँ घर और परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए अपना पूरा समय लगा देती हैं। वे सुबह सबसे पहले उठती हैं और रात में सबसे अंत में विश्राम करती हैं। उनके कार्यों का कोई निश्चित समय नहीं होता और न ही कोई अवकाश। इसके बावजूद उनके श्रम का आर्थिक मूल्य नहीं आँका जाता। यह स्थिति केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के अनेक देशों में घरेलू कार्य को लंबे समय तक अदृश्य श्रम माना जाता रहा है।
घरेलू श्रम का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह पूरे समाज की उत्पादकता को संभव बनाता है। यदि घर व्यवस्थित न हो, बच्चों का पालन-पोषण न हो और परिवार के सदस्य स्वस्थ एवं सुरक्षित वातावरण न पाएँ, तो कोई भी व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में पूरी क्षमता से योगदान नहीं दे सकता। इस दृष्टि से घरेलू श्रम केवल परिवार की सेवा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला भी है।
घरेलू कार्यों को केवल महिलाओं की जिम्मेदारी मानना भी एक सामाजिक सोच का परिणाम है। आधुनिक समाज में यह आवश्यक है कि परिवार के सभी सदस्य घरेलू कार्यों की जिम्मेदारी साझा करें। जब पुरुष और बच्चे भी घर के कार्यों में भागीदारी निभाते हैं, तब न केवल महिलाओं का कार्यभार कम होता है, बल्कि परिवार में समानता, सहयोग और सम्मान की भावना भी विकसित होती है। बच्चों में भी लैंगिक समानता के संस्कार बचपन से ही विकसित होते हैं।
आज समय की मांग है कि घरेलू श्रम को केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी महत्व दिया जाए। कई देशों में इस विषय पर गंभीर चर्चा हो रही है कि राष्ट्रीय आय के आकलन में घरेलू कार्यों के योगदान को किस प्रकार शामिल किया जाए। भले ही हर घरेलू कार्य का प्रत्यक्ष आर्थिक मूल्य निर्धारित करना सरल न हो, लेकिन उसकी उपयोगिता और महत्व को स्वीकार करना अत्यंत आवश्यक है।
घरेलू श्रम का सम्मान केवल कानून बनाने या आर्थिक सहायता देने से पूरा नहीं होगा। इसके लिए समाज की सोच में परिवर्तन सबसे अधिक आवश्यक है। परिवार में महिलाओं के निर्णयों का सम्मान, उनके कार्यों की सराहना, उनके लिए विश्राम और आत्म-विकास के अवसर उपलब्ध कराना तथा उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी सम्मान का ही हिस्सा है। जब परिवार के सदस्य “धन्यवाद” और “आपकी मेहनत की कद्र है” जैसे सरल शब्द कहते हैं, तो यह सम्मान महिलाओं के आत्मविश्वास को नई ऊर्जा देता है।
शिक्षा भी इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। विद्यालयों में बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए कि घरेलू कार्य केवल महिलाओं का दायित्व नहीं, बल्कि परिवार के प्रत्येक सदस्य की साझा जिम्मेदारी है। यदि नई पीढ़ी इस सोच के साथ बड़ी होगी, तो भविष्य में अधिक समान और संवेदनशील समाज का निर्माण संभव होगा।
तकनीक भी महिलाओं के घरेलू कार्यों को सरल बनाने में सहायक बन सकती है। आधुनिक रसोई उपकरण, डिजिटल सेवाएँ और समय बचाने वाली तकनीकें महिलाओं के श्रम को कम कर सकती हैं। लेकिन तकनीक तभी प्रभावी होगी, जब परिवार के सदस्य सहयोग की भावना भी अपनाएँ।
घरेलू श्रम का सम्मान महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण से भी जुड़ा हुआ है। जब परिवार महिलाओं को शिक्षा, कौशल विकास और आर्थिक निर्णयों में भागीदारी का अवसर देता है, तब उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे समाज के विकास में और अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं। सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अवसरों और समान अधिकारों से भी मिलता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम घरेलू कार्यों को “स्वाभाविक जिम्मेदारी” नहीं, बल्कि “महत्वपूर्ण योगदान” के रूप में देखें। यह बदलाव केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के हित में होगा। जिस समाज में मातृशक्ति को सम्मान मिलता है, वहाँ परिवार अधिक मजबूत, बच्चे अधिक संस्कारित और समाज अधिक संवेदनशील बनता है।
अंततः, घरेलू श्रम का सम्मान केवल महिलाओं के अधिकारों का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा का विषय है। मातृशक्ति के निस्वार्थ योगदान को पहचानना और उसका सम्मान करना एक विकसित, समतामूलक और संवेदनशील भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। जब घर के भीतर किए जाने वाले श्रम को उचित सम्मान मिलेगा, तभी वास्तविक अर्थों में महिलाओं की गरिमा स्थापित होगी और “नारी सम्मान” का विचार केवल नारों तक सीमित न रहकर जीवन का व्यवहारिक सत्य बन सकेगा।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


