
उदयपुर | शाबाश इंडिया।
सूखती नदियों, विलुप्त होते झरनों, उजड़ते वनों और बदलते प्राकृतिक स्वरूप की पीड़ा जब कविता में ढलती है, तो वह पर्यावरण संरक्षण की प्रभावशाली आवाज बन जाती है। इसी संवेदना को शब्द देते हुए प्रख्यात शिक्षाविद् एवं भूगोलवेत्ता प्रो. पी.आर. व्यास के काव्य-संग्रह ‘प्रकृति के प्रतिबिंब’ का रविवार को साहित्यकारों और शिक्षाविदों की गरिमामयी उपस्थिति में लोकार्पण किया गया।
प्रकृति रिसर्च सोसाइटी के संस्थापक अध्यक्ष एवं मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. व्यास की इस कृति में प्राकृतिक सौंदर्य, पर्यावरणीय संकट और मानवीय संवेदनाओं को काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी गई है।
समारोह की अध्यक्षता पूर्व कुलपति प्रो. आई.वी. त्रिवेदी ने की। मुख्य अतिथि पूर्व राज्यमंत्री जगदीश श्रीमाली थे। विशिष्ट अतिथियों में राजस्थान साहित्य अकादमी के सचिव बसंत सोलंकी, वरिष्ठ साहित्यकार किशन दाधीच, कवि राधेश्याम मेवाड़ी और पूर्व अतिरिक्त नगर नियोजक सतीश श्रीमाली शामिल रहे।
सूखती नदियों और उजड़ते वनों की पीड़ा ने किया भावुक
लोकार्पण के बाद प्रो. व्यास ने अपनी सृजन यात्रा साझा की और काव्य-संग्रह की कविताओं की लयबद्ध प्रस्तुति दी। सूखते शैलशिखरों, नदियों, झरनों और वनराई की पीड़ा को अभिव्यक्त करती रचनाओं ने श्रोताओं को प्रकृति के बदलते स्वरूप पर गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित किया।
कवि राधेश्याम मेवाड़ी ने कहा कि प्रो. व्यास ने भूगोल के वैज्ञानिक ज्ञान और साहित्यिक संवेदनाओं का सुंदर समन्वय किया है। किशन दाधीच ने इस कृति को पर्यावरण संरक्षण की चेतना जगाने वाला महत्वपूर्ण साहित्यिक प्रयास बताया।
साहित्य समाज को उसकी जिम्मेदारियों का कराता है एहसास
राजस्थान साहित्य अकादमी के सचिव बसंत सोलंकी ने कहा कि ऐसी रचनाएं समाज को प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का अहसास कराती हैं। साहित्यकार प्रो. मलय पानेरी एवं मंजू चतुर्वेदी ने काव्य-संग्रह की समीक्षा करते हुए इसकी भावभूमि, संवेदनशीलता और रचनात्मक विशेषताओं पर प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि जगदीश श्रीमाली ने साहित्य के सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व पर विचार रखे। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. त्रिवेदी ने शिक्षा, साहित्य और प्रकृति के अंतर्संबंधों को रेखांकित किया। सतीश श्रीमाली ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
समारोह का शुभारंभ सरस्वती चित्र पर माल्यार्पण और प्रकृति शोध संस्थान के कुलगीत से हुआ। इस गीत के रचनाकार प्रो. व्यास, संगीतकार प्रो. प्रेम भंडारी तथा स्वर प्रदाता पामिल भंडारी हैं।
प्रो. पलक भारद्वाज ने स्वागत किया। शिक्षाविद् डॉ. सरिता जैन ने संचालन और डॉ. देवेंद्र सिंह चौहान ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. विष्णु शंकर पालीवाल रहे।
रिपोर्ट: राकेश शर्मा ‘राजदीप’


