
भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया।
भगवान महावीर निर्वाण महोत्सव पर पहली बार होगी भव्य पावापुरी की रचना, 24 निर्वाण लाडू चढ़ाए जाएंगे
सूर्यमहल में आचार्य पुलकसागर महाराज की मंगल दिव्य देशना के साथ ‘जीवन जीने की कला’ प्रवचन श्रृंखला का समापन
आत्मकल्याण की राह पर आगे बढ़ना है तो अपना दिल बड़ा करना होगा और दूसरों की गलतियों के लिए भी क्षमा मांगने का भाव विकसित करना होगा। ‘जियो और जीने दो’ का संदेश इसी भावना पर आधारित है, लेकिन आज मनुष्य दूसरों को जीने देने के बजाय केवल अपने स्वार्थ पर ध्यान दे रहा है। हमारी दृष्टि दूसरों के गुणों के बजाय उनकी कमियों पर अधिक रहती है। यह विचार राष्ट्रसंत आचार्य मनोज्ञ पुलकसागर महाराज ने शनिवार को शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में व्यक्त किए।
श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मेन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से आयोजित चातुर्मास के दौरान आचार्यश्री की मंगल दिव्य देशना एवं अंतिम चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला ‘जीवन जीने की कला’ का समापन हुआ। भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे आचार्यश्री ने कहा कि दुनिया में कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता। न किसी में शत-प्रतिशत गुण होते हैं और न ही अवगुण। दूसरों की गलतियों के लिए क्षमा मांगने का भाव न होने से परिवारों में अशांति और कलह बढ़ती है।
वर्तमान को सुधारें, भविष्य अपने आप संवरेगा
आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में हमेशा वर्तमान में जीने का प्रयास करना चाहिए। जो बीत चुका है, उसे बदला नहीं जा सकता और भविष्य हमारे हाथ में नहीं है। इसलिए वर्तमान को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए। मनुष्य जीवन अपनी गलतियों को सुधारने का अवसर है। हमें दोहरे चरित्र का त्याग करना होगा।
उन्होंने कहा कि हम किसी व्यक्ति के जीवित रहते उसकी परवाह नहीं करते, लेकिन उसके निधन के बाद आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। आत्मिक शांति केवल प्रार्थनाओं से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से प्राप्त होती है। जो व्यक्ति जीवन में ही शांति का मार्ग अपना लेता है, वही समाधि मरण की दिशा में आगे बढ़ता है। आचार्यश्री ने कहा कि जो पूरी जिंदगी शांति से जीता है, वही शांति से विदा हो सकता है।
खुद बदलेंगे तो परिवार भी बदलेगा
आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि यदि हम स्वयं को बदलना सीख लें तो परिवार का वातावरण भी बदल सकता है। हमारा मूड अच्छा हो तो बड़ी गलती भी नजरअंदाज कर देते हैं और मूड खराब होने पर छोटी गलती के लिए भी कठोर सजा देते हैं। यही व्यवहार परिवारों में तनाव और कलह का कारण बनता है। उन्होंने आवेश में आकर निर्णय नहीं लेने की सीख दी। आचार्यश्री ने कहा कि जो महावीर और अन्य तीर्थंकरों की तरह भीतर आत्मशुद्धि कर लेता है, वह न्याय और विवेक का मार्ग अपना लेता है।
दीपावली पर पहली बार बनेगी भव्य पावापुरी
श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि आचार्यश्री का 1 से 3 नवंबर तक बापूनगर दिगम्बर जैन मंदिर में प्रवास रहेगा। उनके सान्निध्य में 6 से 8 नवंबर तक धनतेरस से अमावस्या के अवसर पर मध्यरात्रि के बाद मंत्र साधना होगी। चातुर्मास के मंगल कलश स्थापित करने वाले श्रावक परिवार 6 से 8 नवंबर तक सुबह 8 से 10 बजे के बीच आचार्यश्री के आशीर्वाद से अपने कलश प्राप्त कर घर पर स्थापित कर सकेंगे।
दीपावली पर 9 नवंबर को सुबह 8 बजे सूर्यमहल में भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण महोत्सव पर मुख्य निर्वाण लाडू सहित 24 लाडू अर्पित किए जाएंगे। इस अवसर पर प्रसिद्ध झांकी रचनाकार नंदनभाई द्वारा भीलवाड़ा में पहली बार भव्य पावापुरी की रचना की जाएगी। ऐतिहासिक चातुर्मास पूर्ण होने के बाद आचार्यश्री 15 नवंबर को भीलवाड़ा से विहार करेंगे।
प्रवचन के प्रारंभ में पुण्यार्जक परिवार को पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कार्यक्रम का संचालन चातुर्मास समिति के महामंत्री जयकुमार पाटनी ने किया।


