Sunday, November 1, 2026

जयपुर की अनमोल ऐतिहासिक धरोहर: श्री दिगम्बर जैन मंदिर दीवान बधीचन्द जी साहब में आज भी जीवित है सदियों पुरानी विरासत

जयपुर | शाबाश इंडिया।

जयपुर के हृदयस्थल जौहरी बाजार की ऐतिहासिक गलियों में स्थित श्री दिगम्बर जैन मंदिर दीवान बधीचन्द जी साहब केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि प्राचीन प्रतिमाओं, स्वर्ण कला, दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथों और जैन दर्शन की समृद्ध ज्ञान परंपरा का अनमोल संगम है। इस मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक धरोहरें जयपुर की सांस्कृतिक विरासत को विशिष्ट पहचान प्रदान करती हैं।

1. लगभग 800 वर्ष पुरानी भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा का प्रतिष्ठा इतिहास

मंदिर के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, यहाँ विराजित भगवान पार्श्वनाथ की एक प्रतिमा की प्रतिष्ठा विक्रम संवत 1291 (लगभग 1234 ईस्वी) में होने का उल्लेख मिलता है। इस आधार पर प्रतिमा का प्रतिष्ठा इतिहास लगभग 790 वर्ष से अधिक पुराना है। यह मंदिर की प्रमुख ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है।

2. स्वर्ण कला से सुसज्जित अद्भुत गुम्बद

मंदिर के गुम्बद पर किया गया बारीक स्वर्ण कार्य जयपुर की पारंपरिक स्थापत्य कला और उत्कृष्ट कारीगरी का सुंदर उदाहरण है। इसकी भव्यता और कलात्मक सज्जा मंदिर को विशिष्ट पहचान देती है।

3. पंडित टोडरमल जी की हस्तलिखित ‘मोक्षमार्ग प्रकाशक’

मंदिर की अमूल्य धरोहरों में महान जैन दार्शनिक पंडित टोडरमल जी की स्वयं की हस्तलिपि मानी जाने वाली ‘मोक्षमार्ग प्रकाशक’ की दुर्लभ पांडुलिपि का उल्लेख किया जाता है। मंदिर के शास्त्र भंडार और साहित्यिक गतिविधियों से उनका ऐतिहासिक संबंध जैन दर्शन एवं आत्मज्ञान की समृद्ध परंपरा को दर्शाता है।

4. ऐतिहासिक शास्त्र भंडार में 1,278 हस्तलिखित ग्रंथ

प्रकाशित ऐतिहासिक शोध के अनुसार, मंदिर के शास्त्र भंडार में 1,278 हस्तलिखित ग्रंथों एवं पांडुलिपियों का विवरण दर्ज है। इनमें 162 गुटके (लघु हस्तलिखित ग्रंथ) और 1,116 अन्य हस्तलिखित ग्रंथ शामिल बताए गए हैं। इनका संबंध संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और हिंदी भाषा के धर्म, दर्शन, साहित्य एवं अध्यात्म विषयक ज्ञान से है।

5. लगभग 650 वर्ष पुरानी पांडुलिपि

ऐतिहासिक शोध में मंदिर के ग्रंथ संग्रह से संबंधित विक्रम संवत 1431 (लगभग 1374 ईस्वी) की एक पांडुलिपि का उल्लेख मिलता है। यह लगभग साढ़े छह शताब्दी पुरानी ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण प्रमाण है।

6. वास्तविक सोने की जरी से निर्मित भव्य चंदवा

मंदिर में वास्तविक स्वर्ण जरी से निर्मित कलात्मक चंदवा भी संरक्षित है। इसकी बारीक कढ़ाई, पारंपरिक आकृतियाँ और शिल्पकला भारतीय वस्त्र एवं धार्मिक कला की समृद्ध विरासत को प्रदर्शित करती हैं।

7. लगभग 290 वर्ष पुराना ऐतिहासिक मंदिर

मंदिर का इतिहास जयपुर के तत्कालीन दीवान परिवार से जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक शोध में इसके निर्माण का समय लगभग 1735 से 1738 ईस्वी के बीच बताया गया है। इस दृष्टि से यह जयपुर के प्रारंभिक ऐतिहासिक काल की महत्वपूर्ण धरोहर है।

8. दुर्लभ जैन साहित्य का संग्रह

मंदिर के ऐतिहासिक ग्रंथ संग्रह में ‘हरिवंश पुराण’, ‘प्रद्युम्न चरित’ सहित अनेक महत्वपूर्ण जैन साहित्यिक कृतियों का उल्लेख मिलता है। इनमें कुछ पांडुलिपियों को शोधकर्ताओं ने अत्यंत दुर्लभ बताया है।

9. ऐतिहासिक शोध एवं सरकारी अभिलेखों में उल्लेख

मंदिर के शास्त्र भंडार का विवरण ऐतिहासिक पुस्तकों, वर्ष 1957 में प्रकाशित ग्रंथ सूची तथा भारत सरकार के National Mission for Manuscripts की संग्रह-संबंधी निर्देशिका में भी मिलता है। यह इस मंदिर की विरासत के राष्ट्रीय महत्व को रेखांकित करता है।

हमारी विरासत, हमारी जिम्मेदारी

एक ही मंदिर परिसर में लगभग 800 वर्ष पुराने प्रतिमा-प्रतिष्ठा इतिहास, 650 वर्ष पुरानी पांडुलिपि, स्वर्ण कला से सुसज्जित गुम्बद, वास्तविक सोने की जरी का चंदवा और पंडित टोडरमल जी की ज्ञान परंपरा से जुड़े संदर्भ मिलना अपने आप में गौरवपूर्ण है।

श्री दिगम्बर जैन मंदिर दीवान बधीचन्द जी साहब केवल जैन समाज की आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि जयपुर, राजस्थान और भारत की सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसी धरोहरों को जानना, उनका संरक्षण करना और आने वाली पीढ़ियों तक उनका इतिहास पहुँचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।

मंदिर: श्री दिगम्बर जैन मंदिर दीवान बधीचन्द जी साहब
स्थान: घी वालों का रास्ता, जौहरी बाजार, जयपुर
अध्यक्ष: श्री दिनेश शाह जी

जयपुर की विरासत — विश्व की धरोहर।

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