
इन्दौर | शाबाश इंडिया।
धर्म करने की कोई सीमा निर्धारित नहीं करनी चाहिए। समय की कमी का बहाना बनाकर पाठशाला जाने, स्वाध्याय करने और धार्मिक गतिविधियों से दूर नहीं रहना चाहिए। कर्म जब अपना फल देता है, तब व्यक्ति को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है, जहां उसके पास समय तो होगा, लेकिन मंदिर और धर्म करने के अवसर नहीं होंगे। इसलिए जीवन में धर्म के लिए समय निकालना आवश्यक है। यह प्रेरणादायी विचार निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज ने दलाल बाग मैदान, इन्दौर में आयोजित द्वादश वर्षीय श्रमण संस्कृति पाठ्यक्रम संगोष्ठी को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
मुनि श्री ने राग और द्वेष के अंतर को समझाते हुए कहा कि राग कब बढ़ता चला जाता है, इसका पता भी नहीं चलता, जबकि द्वेष व्यक्ति को मानसिक तनाव और अशांति की ओर ले जाता है। द्वेष के कारण व्यक्ति की स्थिति इतनी बिगड़ सकती है कि उसका स्वास्थ्य भी प्रभावित हो जाए। राग लंबे समय तक बना रहता है, इसलिए उसे छोड़ना कठिन होता है। इसी कारण धर्म को वीतरागी कहा गया है। जीवन में राग को छोड़ने का प्रयास करना चाहिए और मन को निर्मल बनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण का अपना विशेष महत्व है। गुरु के मुख से निकले शब्द भले ही वही हों, लेकिन हर बार उन्हें सुनने पर नए भाव और नई अनुभूति होती है। गुरु को नमोस्तु करने पर भी हर बार आशीर्वाद की नई अनुभूति होती है, जो व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान करती है।
सुख के समय धर्म की जरूरत अधिक
मुनि श्री सुधासागरजी महाराज ने कहा कि मनुष्य दुख आने पर उससे बचने के उपाय खोजता है और भगवान की भक्ति में लग जाता है। कोई दुख दूर करने के लिए 48 बार भक्तामर स्तोत्र और 40 बार चालीसा का पाठ करता है, लेकिन वास्तविक परीक्षा तब है, जब सुखी व्यक्ति भी नियमित रूप से धर्म और स्वाध्याय करे।
उन्होंने बालक के उदाहरण से समझाया कि जिस प्रकार बच्चे को कड़वी नीम की निंबोली अच्छी नहीं लगती और उसे सही दिशा देने के लिए मां की जरूरत होती है, उसी प्रकार जीवन में धर्म और जिनवाणी का मार्गदर्शन आवश्यक है। क्रोध अग्नि के समान है, जो स्वयं को और दूसरों को भी कष्ट पहुंचाता है। वहीं, राग व्यक्ति को अच्छा अनुभव करा सकता है, लेकिन उसके बंधन से मुक्त होना कठिन है। इसलिए राग के प्रभाव को समझकर धर्म और स्वाध्याय के माध्यम से आत्मकल्याण का प्रयास करना चाहिए।
धन-संपत्ति के साथ धर्म की सावधानी भी जरूरी
मुनि श्री ने कहा कि जीवन में जो अनिष्टकारी है, उससे बचाने का कार्य धर्म करता है। धर्म मनुष्य को दुखों और जीवन की कठिनाइयों के बीच सही रास्ता दिखाता है। धर्म के लिए कोई निश्चित समय नहीं है; इसे दिन में भी किया जा सकता है और रात में भी।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को सुख-सुविधाओं के समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। कठिनाइयों के दौरान तो व्यक्ति स्वतः ही सहारा खोजता है, लेकिन सुख और संपन्नता में भटकने की आशंका अधिक रहती है। धन-संपत्ति मिलने पर व्यक्ति गलत आदतों की ओर जा सकता है, इसलिए ऐसे समय में धर्म, संयम और गुरु का मार्गदर्शन अधिक आवश्यक है।
मुनि श्री ने कहा कि जगत के भगवान की आराधना के साथ अपने आत्मकल्याण का प्रयास भी जरूरी है। इसी प्रकार गुरु के प्रति श्रद्धा रखते हुए उनके बताए मार्ग पर चलना चाहिए। धर्म का उद्देश्य केवल दुखों से मुक्ति की कामना करना नहीं, बल्कि जीवन में सदाचार, संयम और आत्मकल्याण की भावना विकसित करना भी है।
17 से 19 अक्टूबर तक होगा राष्ट्रीय स्नातक परिषद का अधिवेशन
महासभा संयोजक विजय धुर्रा ने बताया कि परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज के सान्निध्य में राष्ट्रीय स्नातक परिषद का अधिवेशन 17 से 19 अक्टूबर तक दलाल बाग मैदान, इन्दौर में आयोजित किया जाएगा। अधिवेशन में श्रद्धालुओं को गुरुदेव का विशेष मार्गदर्शन प्राप्त होगा।
इस आयोजन को लेकर श्री दिगंबर जैन धर्म प्रभावना समिति, इन्दौर के चक्रवर्ती सपना मनीष गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद नवीन गोधा, चातुर्मास अध्यक्ष रानी अशोक जोशी, स्वागत अध्यक्ष संजय सामरिया, धर्मेन्द्र सिमकेम, गिरीश गिन्नी, महामंत्री हर्ष जैन, मंत्री अक्षय कासलीवाल, कोषाध्यक्ष आकाश जैन और उपकोषाध्यक्ष सौरव बड़जात्या सहित अन्य प्रमुखजनों ने सभी से अधिवेशन में शामिल होने का आग्रह किया।
संयोजकों और उपसंयोजकों का सम्मान
द्वादश वर्षीय श्रमण संस्कृति महाधिवेशन के दौरान परम पूज्य आध्यात्मिक संत निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज ससंघ, अठारह पिच्छिकाओं के सान्निध्य में विभिन्न नगरों के संयोजकों और उपसंयोजकों का सम्मान किया गया। श्री दिगंबर जैन धर्म प्रभावना समिति, इन्दौर की ओर से सम्मानित अतिथियों को पीत वस्त्र, तिलक, शॉल और श्रीफल भेंट किए गए।
इस अवसर पर मध्यप्रदेश महासभा संयोजक विजय धुर्रा, सूरत के ज्ञानेन्द्र गदिया और शिवपुरी-मुरैना के जयदीप शास्त्री सहित अन्य प्रमुखजनों का सम्मान किया गया। कार्यक्रम में प्राचार्य डॉ. शास्त्री ने कहा कि स्वाध्याय ऐसा कार्यक्रम है, जो जीवन में सरलता, सरसता और ज्ञान की वृद्धि का माध्यम बनता है।


