
इंदौर | शाबाश इंडिया।
33वें श्रावक संस्कार शिविर के पावन अवसर पर दलाल बाग मैदान में आयोजित विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रसंत मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज ने उत्तम मार्दव धर्म का संदेश देते हुए कहा कि अग्नि की परीक्षा से गुजरकर माटी मंगल कलश बनती है। इसी प्रकार जीवन में कठिन परिस्थितियों से गुजरकर विनम्रता और मार्दव का भाव प्रकट होता है। उन्होंने कहा, “जिसे ऊंचा उठना है, उतना ही झुकना सीखो। सबसे आगे चलना है तो सबसे पीछे चलना सीखो।”
मुनि श्री ने कहा कि स्वाभिमान की आड़ में अभिमान नहीं करना चाहिए। उन्होंने नारायण श्रीकृष्ण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि शांति के लिए श्रीकृष्ण जैसे महापुरुष भी दुर्योधन के सामने दूत बनने के लिए तैयार हुए। शांति और धर्म के लिए पद और प्रतिष्ठा को पीछे रखकर झुकना ही मार्दव धर्म का श्रेष्ठ उदाहरण है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति शांति, धर्म और लोककल्याण के लिए झुकता है और अपमान भी सहन कर लेता है, तब समझना चाहिए कि उसके भीतर मार्दव का भाव प्रकट हो रहा है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति अक्सर अपने से कमजोर व्यक्ति पर क्रोध करता है, जबकि वास्तविक महानता विनम्रता में है। उन्होंने परिवार और संबंधों में शांति बनाए रखने के लिए त्याग और समझदारी के महत्व को भी बताया।
मध्यप्रदेश महासभा के संयोजक विजय धुर्रा ने कहा कि 33वां श्रावक संस्कार शिविर देशभर से आए हजारों शिविरार्थियों के लिए इंदौर को तपस्या स्थली में परिवर्तित कर रहा है। उन्होंने बताया कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र की गुरुकुल परंपरा के अनुरूप आयोजित इस शिविर में संस्कारों के साथ देशभक्ति का भी बीजारोपण किया जा रहा है। शिविर के प्रथम सत्र की शुरुआत ध्यान के माध्यम से होती है।
मुनि श्री सुधासागरजी महाराज ने शिविर में उपस्थित हजारों श्रावक-श्राविकाओं को अहंकार त्यागकर विनम्रता अपनाने और आत्मचिंतन की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि मार्दव का अर्थ केवल विनम्र शब्दों का प्रयोग करना नहीं, बल्कि मन से अहंकार, मान और श्रेष्ठता के भाव को समाप्त करना है। मनुष्य जितना बड़ा बनता जाता है, उसके भीतर उतनी ही विनम्रता आनी चाहिए। फल से लदा वृक्ष सदैव झुकता है, जबकि खाली वृक्ष अकड़ा हुआ खड़ा रहता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आत्ममंथन करते हुए पूछा कि हम जीवन में सम्मान चाहते हैं, लेकिन क्या दूसरों को सम्मान देने के लिए तैयार हैं? हम चाहते हैं कि लोग हमारी बात सुनें, लेकिन क्या हम दूसरों की बात सुनने की विनम्रता रखते हैं? उन्होंने कहा कि यही मार्दव धर्म व्यक्ति को अपने भीतर झांकने और व्यवहार में विनय लाने की शिक्षा देता है। जहां अहंकार होता है, वहां संबंध कमजोर पड़ते हैं, जबकि विनम्रता से प्रेम, आत्मीयता और शांति का जन्म होता है। भगवान बनने की यात्रा अहंकार से नहीं, विनय से शुरू होती है।
मुनि श्री ने कहा कि पहले गुरु के सामने झुकना सीखें, फिर माता-पिता और गुणवानों के सामने तथा अंततः अपने भीतर बैठे अहंकार को झुकाना सीखें। जो व्यक्ति झुकना सीख जाता है, वही वास्तव में ऊंचा उठने के योग्य बनता है। उन्होंने कहा, “झुकना कमजोरी नहीं, महानता की पहचान है।”
धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने पद, धन, विद्या और प्रतिष्ठा का अहंकार न करने, गुणवानों का सम्मान करने तथा अपने व्यवहार में विनम्रता अपनाने का संकल्प लिया। साथ ही परिवार और समाज में प्रेम, एकता एवं संस्कारों को बढ़ावा देने का संकल्प भी लिया गया।
धर्मसभा में चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन जी गोधा, सामाजिक संसद अध्यक्ष आनंद जी गोधा, चक्रवर्ती मनीष जी गोधा, महोत्सव अध्यक्ष अशोक जी डोशी, महामंत्री हर्ष जी जैन, आकाश जी कोयला, प्रिंसिपल जी टोंग्या, संजय जी पाटोदी, हुकुमचंद जी जैन काका, प्रदीप जी ब्रह्मचारी, विनोद जी भैया, विजय जी धुर्रा, प्रचार प्रमुख संजय पाटौदी, सोनाली बागड़िया, अर्चना गोधा, सौरभ बड़जात्या, राहुल जी सेठी, भूपेंद्र जी भोपाली सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी समाजजन उपस्थित रहे।


