
जयपुर | शाबाश इंडिया।
गैस्ट्राइटिस में पेट की अंदरूनी परत में सूजन या जलन हो सकती है। कुछ मामलों में पेट की परत क्षतिग्रस्त होती है, लेकिन सूजन कम या नहीं होती। ऐसी स्थिति को गैस्ट्रोपैथी कहा जाता है। कई लोगों में गैस्ट्राइटिस होने के बावजूद स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते।
गैस्ट्राइटिस के प्रमुख लक्षणों में ऊपरी पेट में दर्द, जलन या भारीपन, खट्टी डकार, पेट फूलना, मतली या उल्टी, थोड़ा खाने पर ही पेट जल्दी भर जाना, भोजन के बाद अत्यधिक भारीपन और भूख कम लगना शामिल हैं। कुछ मामलों में वजन भी कम हो सकता है।
गैस्ट्राइटिस का एक प्रमुख कारण एच. पायलौरी (H. pylori) बैक्टीरिया का संक्रमण है। इसके अलावा आइब्रूफेन और ऐस्पिरिन जैसी कुछ दर्द निवारक दवाओं का लंबे समय तक सेवन, अधिक शराब का सेवन, पित्त का पेट में वापस आना और गंभीर बीमारी, चोट या आईसीयू जैसी परिस्थितियों में होने वाला शारीरिक तनाव भी इसके कारण हो सकते हैं। कुछ मामलों में ऑटोइम्यून बीमारी भी इसकी वजह बन सकती है। दुर्लभ मामलों में अन्य संक्रमण या खाद्य एलर्जी जैसे कारण भी सामने आ सकते हैं।
गैस्ट्राइटिस कई प्रकार का हो सकता है। एक्यूट गैस्ट्राइटिस अचानक शुरू होकर कम समय तक रहता है, जबकि क्रोनिक गैस्ट्राइटिस लंबे समय तक बना रह सकता है। एच. पायलौरी संक्रमण के कारण होने वाले गैस्ट्राइटिस को एच. पायलौरी गैस्ट्राइटिस कहा जाता है। पेट की परत में क्षरण या घाव होने पर इरोसिव गैस्ट्राइटिस/गैस्ट्रोपैथी हो सकती है। शराब या बाइल रिफ्लक्स जैसे पदार्थों से होने वाली स्थिति को रिएक्टिव गैस्ट्रोपैथी कहा जाता है। ऑटोइम्यून गैस्ट्राइटिस में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पेट की कुछ कोशिकाओं पर हमला करती है।
जांच के लिए डॉक्टर आवश्यकता के अनुसार एच. पायलौरी स्टूल टेस्ट, यूरिया ब्रीथ टेस्ट, रक्त की जांच और मल में छिपे रक्त की जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। कुछ मामलों में एंडोस्कोपी और बायोप्सी की भी आवश्यकता पड़ सकती है।
बचाव के लिए बिना डॉक्टर की सलाह के गैस या दर्द की दवाओं का नियमित अथवा लंबे समय तक सेवन नहीं करना चाहिए। शराब और धूम्रपान से बचना चाहिए। बहुत अधिक तला-भुना या फास्ट फूड तथा ऐसे खाद्य पदार्थ, जिनसे व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से जलन बढ़ती हो, उन्हें सीमित करना उपयोगी हो सकता है। भोजन धीरे-धीरे और अच्छी तरह चबाकर करना चाहिए।
बार-बार होने वाली गैस, पेट दर्द या जलन को केवल ‘गैस’ मानकर लंबे समय तक स्वयं उपचार नहीं करना चाहिए। समस्या लगातार बनी रहे तो चिकित्सक से परामर्श लेना उचित है। एच. पायलौरी संक्रमण की पुष्टि होने पर चिकित्सकीय सलाह के अनुसार पूरा उपचार लेना जरूरी है। इसके उपचार में आम तौर पर बैक्टीरिया को खत्म करने के लिए एक से अधिक दवाओं, जिनमें एंटीबायोटिक्स भी शामिल हो सकते हैं, का उपयोग किया जाता है।
होम्योपैथी में गैस्ट्राइटिस के लक्षणों के लिए ऐसाफेटिडा, रोबिनिया, लाइकोपोडियम, पल्सेटिला, कार्बो वेज और नक्स वोमिका जैसी दवाओं के नाम बताए जाते हैं। हालांकि, इनके उपयोग को लेकर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है और एच. पायलौरी संक्रमण होने पर प्रमाणित चिकित्सकीय उपचार में देरी नहीं करनी चाहिए।
सावधान रहें: काला या तारकोल जैसा मल, खून की उल्टी अथवा कॉफी के रंग जैसी उल्टी, अचानक बहुत तेज पेट दर्द, चक्कर या बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सा सहायता लें। ये पेट में रक्तस्राव या किसी अन्य गंभीर समस्या के संकेत हो सकते हैं।
लेखक: डॉ. एम.एल. जैन ‘मणि’, एम.ए., बी.एम.एस. (होम्योपैथिक), पीएच.डी., अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वरिष्ठ होम्योपैथ एवं पूर्व शैक्षणिक सदस्य, होम्योपैथिक विश्वविद्यालय, जयपुर।


