
जयपुर | शाबाश इंडिया।
जैन धर्म के बीस तीर्थंकरों की निर्वाण भूमि एवं शाश्वत सिद्ध क्षेत्र श्री सम्मेद शिखर जी पर्वत की 52 किलोमीटर की सातवीं बार परिक्रमा के लिए जयपुर से विशेष तीर्थयात्रा का आयोजन किया जा रहा है। सिद्धार्थ नगर जयपुर जैन समाज की ओर से आयोजित इस यात्रा में 200 यात्री शामिल होंगे। तीर्थयात्रा कार्यक्रम गौरव मुनि श्री 108 विशाल सागर महाराज की पावन प्रेरणा से आयोजित किया जा रहा है।
यात्रा के मुख्य संयोजक महावीर रांवका ने बताया कि यात्री दल 1 अक्टूबर को जयपुर से श्री सम्मेद शिखर जी के लिए रवाना होगा। यात्रा के दौरान तीर्थ वंदना, श्री सम्मेद शिखर विधान तथा पर्वतराज की परिक्रमा सहित विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
उन्होंने बताया कि सातवीं बार पर्वत की परिक्रमा करवाने वाली संस्था श्री विद्यासागर यात्रा संघ जयपुर के पूर्ण सहयोग से इस वर्ष भी तीर्थराज की परिक्रमा का आयोजन किया जा रहा है। यात्रा दल द्वारा 3 अक्टूबर को श्री सम्मेद शिखर पर्वत की 27 किलोमीटर की पदवंदना की जाएगी।
4 अक्टूबर को तलहटी स्थित दिगंबर जैन मंदिर में संगीतमय श्री सम्मेद शिखर पूजा विधान एवं आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की महापूजा आयोजित होगी। 5 अक्टूबर की सुबह श्री सम्मेद शिखर जी पर्वत की पैदल परिक्रमा प्रारंभ होगी। रात्रि विश्राम निमियाघाट स्थित दिगंबर जैन मंदिर में किया जाएगा। 6 अक्टूबर को प्रातः मंदिर में अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजा-अर्चना के बाद पर्वत परिक्रमा का कार्यक्रम जारी रहेगा। दो दिवसीय पर्वत परिक्रमा का समापन 6 अक्टूबर की शाम मधुबन में होगा।
राजस्थान जैन युवा महासभा के प्रदेश महामंत्री विनोद जैन ‘कोटखावदा’ ने बताया कि तीर्थराज सम्मेद शिखरजी के कण-कण में सिद्धत्व की आभा एवं निर्वाण की ज्योति मानी जाती है। उन्होंने कहा कि यह पावन क्षेत्र अनादिनिधन सिद्ध क्षेत्र है और जैन समाज में इसकी विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्ता है।
उन्होंने बताया कि सम्मेद शिखरजी की ऊंचाई 4579 फुट तथा क्षेत्रफल लगभग 25 वर्ग किलोमीटर है। जैन मान्यता के अनुसार वर्तमान चौबीसी के 20 तीर्थंकरों सहित असंख्य मुनिराजों ने इस पावन क्षेत्र से कर्मों का नाश कर मोक्ष पद प्राप्त किया।
विनोद जैन कोटखावदा ने बताया कि जैन धर्म में तीर्थराज सम्मेद शिखरजी की वंदना को अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। वर्तमान चौबीसी के द्वितीय तीर्थंकर श्री अजितनाथ भगवान के मोक्ष प्राप्त करने के बाद से ही अनेक चक्रवर्तियों और जैन आचार्यों द्वारा संघ सहित इस पावन तीर्थ की वंदना किए जाने की परंपरा रही है।
उन्होंने बताया कि बीसवीं सदी के प्रथम चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागरजी महाराज दक्षिण ने भी सन् 1927 में चतुर्विध संघ सहित तीर्थराज की पदवंदना के लिए विहार किया था। इसी प्रकार इस सदी के महान आचार्य श्री 108 विद्यासागरजी महामुनिराज ने भी संघ सहित वर्ष 1983 में तीर्थराज श्री सम्मेद शिखरजी की वंदना की थी।
यात्रा के मुख्य संरक्षक मनीष चौधरी ने कहा कि श्री सम्मेद शिखरजी की यात्रा एवं दुर्लभ पर्वत परिक्रमा का अवसर पुण्य का फल माना जाता है। उन्होंने कहा कि जन्म-जन्मांतर के पुण्य के फलित होने पर ही ऐसे पावन तीर्थ की यात्रा और परिक्रमा का अवसर प्राप्त होता है।
यात्रा आयोजकों ने बताया कि सातवीं बार आयोजित होने वाली इस विशेष तीर्थयात्रा को लेकर जयपुर के जैन समाज में उत्साह है। 200 यात्रियों का दल धार्मिक आयोजनों में सहभागिता करते हुए तीर्थराज सम्मेद शिखरजी की पदवंदना एवं पर्वत परिक्रमा करेगा।
विनोद जैन ‘कोटखावदा’
प्रदेश महामंत्री
राजस्थान जैन युवा महासभा, जयपुर


