
भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया।
रास्ते वही होते हैं, लेकिन चलने वाले बदल जाते हैं। कभी रास्ता गलत नहीं होता, हमारी दिशा गलत होती है। कभी परिस्थिति दोषी नहीं होती, हमारा दृष्टिकोण हमें उलझा देता है। कई बार सामने वाला नहीं, बल्कि हमारा अपना क्रोध हमें हराता है। इसलिए जीवन को बदलने के लिए बाहरी परिस्थितियों से लड़ने से पहले भीतर के मन को जीतना जरूरी है। जहां मन यह संकल्प कर ले कि अब मुझे बदलना है, वहीं से परिवर्तन की शुरुआत होती है। यह विचार श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने शांतिभवन में चातुर्मास के दौरान आयोजित धर्मसभा में श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
युवाचार्यश्री ने संगति के प्रभाव को समझाते हुए श्रेणिक चरित्र का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य अकेला नहीं बदलता, उसके साथ चलने वाली संगति, वातावरण और विचार भी उसे धीरे-धीरे गढ़ते हैं। इसलिए जीवन में यह देखना जरूरी है कि हम किसके साथ चल रहे हैं और उनकी दिशा हमें कहां ले जा रही है। यात्रा में अच्छा साथी मिल जाए तो रास्ता आसान हो जाता है, लेकिन साथी की सोच नकारात्मक हो तो वही रास्ता बोझ बन जाता है।
महासती अमृतकंवरजी के पुण्य स्मृति दिवस का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी पुण्य आत्माओं का स्मरण केवल श्रद्धा प्रकट करने के लिए नहीं, बल्कि उनके जीवन से अपने जीवन की दिशा देखने के लिए होना चाहिए। गुरु का कार्य केवल रास्ता बताना नहीं, बल्कि गलत रास्ते से बचाना भी है।
संयम की व्याख्या करते हुए युवाचार्यश्री ने कहा कि संयम का अर्थ सम्यक नियंत्रण है। अपनी इच्छा और जागरूकता से स्वयं पर नियंत्रण करना ही संयम है। पचक्खाण इसी नियंत्रण को संकल्प में बदलता है। संकल्प अनेक विकल्पों को छोड़कर मन को एक दिशा देता है। इसलिए संयम बाहर से थोपा गया अनुशासन नहीं, बल्कि भीतर से लिया गया निर्णय है।
क्रोध के प्रसंग में उन्होंने कहा कि सामने वाले की भूल देखने से पहले अपनी भूल देखना सीखना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक व्यक्ति रास्ते में ठोकर खाकर स्वयं पर नाराज हुआ और आगे केले के छिलके से फिसलने पर दूसरे को दोष देने लगा। दोनों जगह चूक उसकी अपनी थी, लेकिन दूसरी बार उसने दोष किसी और पर डाल दिया। अपनी भूल पर सफाई और दूसरे की भूल पर क्रोध करना ही वह स्थिति है, जहां मनुष्य स्वयं को देखने की दृष्टि खो देता है।
उन्होंने कहा कि क्रोध को स्वभाव मान लेना सबसे बड़ी भूल है। क्रोध स्वभाव नहीं, बल्कि संस्कारों और आदतों से बना हुआ संयोग है। जो संयोग से बना है, वह पुरुषार्थ से बदला भी जा सकता है। व्यक्ति जब यह मान लेता है कि मेरा स्वभाव ही ऐसा है, तब वह अपने परिवर्तन का रास्ता स्वयं बंद कर देता है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि क्रोध कुछ समय के लिए व्यक्ति को शक्तिशाली होने का भ्रम देता है, लेकिन धीरे-धीरे उसकी अपनी कीमत कम करता जाता है। परिवार में भी यही होता है। लगातार क्रोध संबंधों में सम्मान को भीतर से खोखला कर देता है। इसलिए क्रोध आने पर परिस्थिति को दोष देने के बजाय अपने मन को देखना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि क्रोध मूर्खता से शुरू होकर पश्चात्ताप पर समाप्त होता है। क्रोध के बाद व्यक्ति अक्सर मानता है कि ऐसा नहीं करना चाहिए था, लेकिन कुछ समय बाद वही मन अपने क्रोध का समर्थन करने लगता है कि परिस्थिति ही ऐसी थी, सामने वाले ने मजबूर किया या डांटना जरूरी था। उन्होंने कहा कि कारण सही हो सकता है, लेकिन गलत प्रतिक्रिया को सही नहीं ठहराया जा सकता। परिवर्तन की शुरुआत उसी क्षण होती है, जब व्यक्ति अपनी प्रतिक्रिया को गलत स्वीकार करता है।
मन की आंतरिक प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि बाहर से व्यक्ति कितना भी व्यवस्थित दिखाई दे, भीतर वर्षों से जमा संस्कार अवसर मिलते ही सामने आ जाते हैं। इसलिए स्वयं को बदलने की शुरुआत बाहर से नहीं, मन से करनी होगी। व्यक्ति जब अकेले में अपने व्यवहार को देखता है, अपनी प्रतिक्रिया को पहचानता है और अपनी भूल स्वीकार करता है, तभी वास्तविक परिवर्तन शुरू होता है।
मोबाइल, टीवी, रील्स और धारावाहिकों के बढ़ते प्रभाव पर युवाचार्यश्री ने कहा कि जिसे हम मन को शांत करने का साधन समझते हैं, वह कई बार भीतर की बेचैनी को और बढ़ा देता है। दूसरों के दिखावटी जीवन को बार-बार देखने से तुलना पैदा होती है और तुलना से असंतोष। किसी के घर, कपड़े, आभूषण या जीवनशैली को देखकर अपने जीवन को छोटा समझना मन में नकारात्मकता भरता है। उन्होंने कहा कि जो दिखाई देता है, जरूरी नहीं कि वही पूरा सत्य हो।
दिखावे की दुनिया को समझाते हुए उन्होंने जादूगर का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जादूगर जो दिखाता है, वह आंखों को दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में वैसा होता नहीं। आज की दृश्य दुनिया भी कई बार ऐसी ही है। स्क्रीन पर दिखाई देने वाला जीवन पूरा जीवन नहीं होता। उसके पीछे की वास्तविकता जाने बिना उससे अपनी तुलना करना स्वयं के मन के साथ अन्याय है।
परिवारों में बढ़ती नकारात्मक बातचीत पर उन्होंने कहा कि कई बार व्यक्ति समाधान देने वाले के पास जाने के बजाय ऐसे व्यक्ति को फोन करता है, जो उसके क्रोध को और बढ़ा दे। यदि किसी रिश्ते में समस्या है तो संवाद ऐसा होना चाहिए जो आग में घी न डाले, बल्कि मन को शांत करे और अपनी भूल देखने की दृष्टि दे। पीड़ा को समझना जरूरी है, लेकिन गलत प्रतिक्रिया को स्वीकार कर लेना उससे भी बड़ी भूल है।
युवाचार्यश्री ने स्पष्ट कहा कि परिवर्तन किसी दूसरे के हाथ में नहीं है। गुरु मार्ग दिखा सकते हैं, संकेत कर सकते हैं और प्रेरणा दे सकते हैं, लेकिन भीतर का निर्णय स्वयं को ही करना होगा। कोई दूसरा व्यक्ति हमें उतना नहीं बदल सकता, जितना हमारा अपना संकल्प बदल सकता है।
पांडवों और भगवान कृष्ण के प्रसंग से संकल्प की शक्ति समझाते हुए उन्होंने कहा कि सामर्थ्य होने के बावजूद पांडव अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सके, जबकि कृष्ण ने उसी परिस्थिति में विजय प्राप्त की। अंतर शक्ति का नहीं, संकल्प की दृढ़ता का था। संकल्प कमजोर हो तो सामर्थ्य भी बिखर जाता है और संकल्प दृढ़ हो तो रास्ते बनने लगते हैं।
उन्होंने कहा कि वस्तुओं को पाने के लिए हमने जीवन में अनगिनत संकल्प किए हैं। अब एक संकल्प स्वयं को बदलने का भी होना चाहिए—क्रोध कम करने का, नकारात्मकता छोड़ने का, अपनी भूल स्वीकार करने का और बाहरी आकर्षणों से स्वयं को बचाने का। बदलाव किसी दूसरे के समझाने से पूरा नहीं होता। शुरुआत उस क्षण होती है, जब व्यक्ति स्वयं से कहता है—अब मुझे बदलना है।
साध्वी संबोधीजी ने महासती अमृतकंवरजी के पुण्य स्मृति दिवस पर उनके जीवन, साधना और जैन शासन में योगदान का स्मरण करते हुए गुणानुवाद किया। इस अवसर पर निरंतर चल रही तप आराधना के क्रम में अनेक तपस्वी भाई-बहनों ने युवाचार्यश्री से 2, 3, 4 एवं 5 उपवास तथा आयंबिल के प्रत्याख्यान ग्रहण किए।
वहीं 8 उपवास पूर्ण करने वाली तपस्वी बहन सीमा चपलोत का शांति जैन महिला मंडल की पदाधिकारियों ने शॉल, माला एवं अभिनंदन-पत्र भेंट कर बहुमान किया तथा उनकी तपस्या की अनुमोदना की।
शांतिभवन आनंद अनुभूति वर्षावास के संयोजक कंवरलाल सूरिया एवं संरक्षक नवरतनमल बंब ने बताया कि शुक्रवार को युवाचार्यश्री के सान्निध्य में तपस्वी साध्वी सोम्याश्रीजी म.सा. के 30 उपवास पूर्ण होने के अवसर पर श्रीसंघ की ओर से उनका अभिनंदन किया जाएगा। वर्षावास में निरंतर चल रही तप आराधना के क्रम में उनकी दीर्घ तपस्या की सामूहिक अनुमोदना भी की जाएगी।
प्रवक्ता : सुनील चपलोत
शांतिभवन, भोपालगंज, भीलवाड़ा


