भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया।

परमात्मा के शासन के प्रति अटूट श्रद्धा, आत्मसामर्थ्य की पहचान और पुरुषार्थपूर्ण साधना ही आत्मकल्याण का वास्तविक मार्ग है। साधना केवल साधु-साध्वियों तक सीमित नहीं, बल्कि प्रत्येक मुमुक्षु आत्मा का परम लक्ष्य है। यह विचार श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी महाराज ने कांचीपुरम स्थित आदिनाथ भवन में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।
युवाचार्यश्री ने कहा कि धर्म साधना में प्रगति के लिए अपने अंतर्निहित आध्यात्मिक सामर्थ्य को पहचानना आवश्यक है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे कोई वास्तुकार भवन निर्माण से पूर्व उसका ब्लूप्रिंट तैयार करता है, उसी प्रकार साधक को भी परमात्मा के मार्गदर्शन के अनुसार अपनी साधना का सुविचारित नियोजन करना चाहिए। आत्ममूल्यांकन और आत्मजागृति के बिना साधना पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकती।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार रोगी अपनी पीड़ा बताता है तभी चिकित्सक उचित उपचार कर पाता है, उसी प्रकार साधक को भी अपनी आंतरिक स्थिति और सीमाओं का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। जो व्यक्ति अपने सामर्थ्य और आत्मिक शक्ति को पहचान लेता है, वही साधना के पथ पर स्थिरता और सफलता प्राप्त करता है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि आधुनिक जीवन में भौतिक सुविधाओं का विस्तार तो हुआ है, लेकिन मनुष्य का परिश्रम, सहनशीलता और आत्मबल निरंतर क्षीण हो रहा है। उन्होंने कहा कि सुविधाएँ बढ़ना प्रगति का संकेत हो सकता है, लेकिन यदि उत्साह और आध्यात्मिक चेतना कमजोर हो जाए तो साधना का वास्तविक उत्कर्ष संभव नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रद्धा किसी व्यक्ति या पंथ तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि परमात्मा के शाश्वत शासन और सिद्धांतों पर अडिग रहनी चाहिए। श्रद्धा, आत्मबल और सतत पुरुषार्थ का समन्वय ही आत्मविकास का मार्ग प्रशस्त करता है।
धर्मसभा में युवाचार्यश्री ने कहा कि सांसारिक उत्तरदायित्व निभाते हुए भी धर्म आराधना, स्वाध्याय और आत्मचिंतन से जुड़े रहना ही मानव जीवन की सार्थकता है। उन्होंने कहा कि परमात्मा के शासन के प्रति अटूट श्रद्धा ही साधना की सबसे बड़ी शक्ति है।
इस अवसर पर मेवाड़ गौरव रविन्द्र मुनिजी ने कहा कि कषायों के वास से धर्म का वास्तविक स्वरूप प्रकट नहीं होता। संतों का सान्निध्य आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ माध्यम है।
आदिनाथ भवन में आयोजित इस धर्मसभा से पूर्व युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी सहित संतवृंद के कांचीपुरम पधारने पर श्री संघ द्वारा भव्य स्वागत किया गया। आदिनाथ महिला मंडल ने मंगलगीत के माध्यम से संतवृंद का अभिनंदन किया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।


