Sunday, November 8, 2026

अंतर्घट का उजियारा: निर्वाण से आत्म-दीपक तक

दीपावली पर विशेष

डॉ. अल्पना जैन ‘महाराष्ट्र गौरव’
जिन धर्म रक्षिका, समाज सेविका, मालेगांव

अमावस्या की रात और अनंत प्रकाश का अवतरण

कार्तिक कृष्ण अमावस्या की वह रात साधारण रात नहीं थी। एक ओर संसार को अपनी घनी कालिमा से ढकने की आतुरता थी, तो दूसरी ओर पावापुरी की पावन धरा पर आत्म-प्रकाश का ऐसा सूर्य उदित हो रहा था, जिसे कभी अस्त नहीं होना था। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर और श्रमण संस्कृति के पुरोधा भगवान महावीर ने इसी पावन तिथि पर देह का त्याग कर निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया था।

मान्यता है कि जब भगवान महावीर का भौतिक स्वरूप संसार से विदा हुआ, तो उनके अनुयायियों ने उनकी स्मृति में दीप प्रज्वलित किए। उस समय उपस्थित गणधरों, राजाओं और जनमानस ने मिट्टी के दीपक जलाकर अंधकार को दूर करने का प्रयास किया। बाह्य जगत को आलोकित करने की यह परंपरा आज दीपावली के रूप में हमारे सामने है। किंतु महावीर का वास्तविक संदेश मिट्टी के दीयों की कतारों में नहीं, बल्कि उस परम ज्योति में छिपा है, जो देह के बंधनों से मुक्त होकर सिद्ध अवस्था में प्रतिष्ठित हुई। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जब तक बाहरी चकाचौंध से ध्यान हटाकर भीतर की ओर नहीं मुड़ेगा, तब तक जीवन की वास्तविक दीपावली अधूरी रहेगी।

बाहरी चकाचौंध बनाम आंतरिक आलोक

आज के दौर में दीपावली का स्वरूप बेहद भव्य हो गया है। विद्युत बल्बों की लड़ियां, आसमान को गुंजायमान करते पटाखे और उपहारों का आदान-प्रदान—यह सब आंखों को तो चौंधियाता है, लेकिन मन के भीतर पसरे सन्नाटे और अंधकार को दूर नहीं कर पाता। भगवान महावीर का निर्वाण हमें रुककर आत्मचिंतन करने के लिए प्रेरित करता है।

तोरण-द्वारों को सजाना सरल है, लेकिन अंतःकरण के झरोखों को स्वच्छ करना कठिन। बाजार से महंगे दीये खरीद लाना आसान है, लेकिन भीतर के उस दीपक को खोजना बेहद श्रमसाध्य है, जो सदियों से उपेक्षित पड़ा है। महावीर का पूरा जीवन ही बाहर से भीतर की ओर लौटने की यात्रा है। वे राजसी वैभव, मुकुट और सिंहासन त्यागकर वन की ओर चल पड़े थे। यह पलायन नहीं, बल्कि उस सत्य की खोज थी, जो एकांत और अंतर्मुखता में ही अनुभव किया जा सकता है। जब तक हम भी अपनी वृत्तियों को बाहर से समेटकर भीतर की ओर नहीं मोड़ेंगे, तब तक अंतर्घट का उजियारा संभव नहीं है।

‘अप्पा दीवो भव’: स्वयं के प्रकाश की खोज

भगवान महावीर की देशना का सार आत्मनिर्भरता और आत्मजागरण के संदेश में निहित है। ‘अप्पा दीवो भव’ अर्थात् स्वयं अपने दीपक बनो—यह भाव मनुष्य को उसकी असीम आंतरिक शक्ति का अहसास कराता है। महावीर का दर्शन बताता है कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता है।

हमारे अंतर्मन में व्याप्त अंधकार हमारे अपने ही कषायों—क्रोध, मान, माया और लोभ—का परिणाम है।

  • क्रोध हमारे विवेक को नष्ट कर देता है।
  • मान (अहंकार) हमारी चेतना को संकुचित कर देता है।
  • माया (छल-कपट) भीतर की सरलता और निर्मलता को समाप्त कर देती है।
  • लोभ हमें कभी संतुष्ट नहीं होने देता।

जब तक ये चार विकार हमारे अंतर्घट में विद्यमान हैं, तब तक वहां प्रकाश की किरण प्रवेश नहीं कर सकती। महावीर का निर्वाण इन कषायों के पूर्ण क्षय और आत्मा की शुद्ध अवस्था का प्रतीक है। जैसे ही ये विकार शांत होते हैं, आत्मा का मूल स्वभाव—ज्ञान, दर्शन और आनंद—स्वयं प्रकाशित होने लगता है।

आध्यात्मिक दीपावली: कैसे जलेगा अंतर्घट का दीया?

यदि हम इस निर्वाण महोत्सव पर अपने भीतर वास्तविक उजाला करना चाहते हैं, तो हमें एक आध्यात्मिक दीपक तैयार करना होगा। इस अनूठे दीपक की रूपरेखा कुछ इस प्रकार है—

  • आत्मा की मिट्टी का दीपक: मानव जीवन और शांत मन वह आधार हैं, जिनमें साधना के माध्यम से आत्मिक प्रकाश जगाया जा सकता है।
  • सम्यक् दर्शन, ज्ञान और चारित्र का तेल: जैसे दीपक के लिए तेल आवश्यक है, वैसे ही आत्मा को आलोकित करने के लिए सम्यक् श्रद्धा, सही समझ और सदाचार का आधार जरूरी है।
  • जागरूकता की बाती: हमारी सजगता और वर्तमान क्षण में जीने की क्षमता वह बाती है, जिसे निरंतर प्रज्वलित रखना चाहिए।
  • ध्यान की चिंगारी: जैसे ही हम ध्यान की चिंगारी सुलगाते हैं, अज्ञान का अंधकार धीरे-धीरे दूर होने लगता है।

जब इस प्रकार का दीपक जलता है, तो मनुष्य केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण जगत के लिए प्रकाश-स्तंभ बन जाता है। उसके भीतर से करुणा और अहिंसा की रश्मियां फूटने लगती हैं।

समकालीन प्रासंगिकता: अशांत मन के लिए महावीर का मार्ग

आज का मनुष्य चांद तक पहुंच गया है और महासागरों की गहराइयों को नाप चुका है, लेकिन अपने ही भीतर प्रवेश करने से डरता है। अवसाद, तनाव और अकेलापन आज के युग की बड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे समय में भगवान महावीर का अनेकांतवाद और स्याद्वाद का सिद्धांत हमें वैचारिक उदारता और सहिष्णुता का मार्ग दिखाता है। दूसरों के दृष्टिकोण को समझना और उनका सम्मान करना मानसिक शांति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

अहिंसा केवल किसी जीव की हत्या न करने तक सीमित नहीं है, बल्कि किसी के प्रति मन में दुर्भावना न रखना भी अहिंसा का सूक्ष्म रूप है। जब हम संसार के सभी जीवों को अपने समान देखने लगते हैं, तो हमारे भीतर करुणा और आत्मिक शांति का भाव विकसित होता है। यही वह साधना का मार्ग है, जिस पर चलकर महावीर ने इंद्रियों और कषायों पर विजय प्राप्त की और ‘जिनेंद्र’ कहलाए।

मिट्टी के दीये से चिन्मय ज्योति तक

दीपावली खुशियों का पर्व है, इसमें कोई संदेह नहीं। हमें दीपक भी जलाने चाहिए, मिठाइयां भी बांटनी चाहिए और उत्सव भी मनाना चाहिए। लेकिन इस उत्सव की आड़ में उस महापुरुष के संदेश को नहीं भूलना चाहिए, जिन्होंने हमें आत्मकल्याण और मोक्ष का मार्ग दिखाया।

इस दीपावली पर जब हम पहला दीपक जलाएं, तो एक क्षण के लिए आंखें बंद करके भगवान महावीर के निर्वाण का स्मरण करें। स्वयं से यह संकल्प लें कि इस बार केवल घर की मुंडेर ही नहीं चमकेगी, बल्कि क्षमा की एक लौ मन के किसी कोने में भी प्रज्वलित होगी।

आइए, मिट्टी के दीपक की नश्वर ज्योति से प्रेरणा लेकर अपनी आत्मा की चिन्मय ज्योति को जगाएं। जब भीतर का यह घट उजलेगा, तभी संसार की दीपावली सार्थक होगी और महावीर का निर्वाण महोत्सव मनाना भी वास्तविक अर्थों में सफल होगा।

भीतर की आंख खोलें, भीतर का दीया जलाएं; तभी तो हम सच्चे मायनों में भगवान महावीर के अनुयायी कहलाएं।

भगवान महावीर निर्वाणोत्सव एवं दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

कल्पतरु वेलनेस सेंटर, मालेगांव, नासिक, महाराष्ट्र 🙏

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