
ब्यावर | शाबाश इंडिया।
श्री दिगंबर जैन समाज के दस दिवसीय दशलक्षण महापर्व के दूसरे दिन गुरुवार को उत्तम मार्दव धर्म की पूजा-अर्चना श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ की गई। शहर के विभिन्न जैन मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। जिनालयों में भगवान के अभिषेक, शांतिधारा, विशेष पूजन एवं धार्मिक अनुष्ठान हुए। शाम को महाआरती के साथ धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।
अजमेर रोड स्थित श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में उत्तम मार्दव धर्म की विशेष पूजा-अर्चना की गई। भगवान का प्रथम अभिषेक एवं शांतिधारा करने का सौभाग्य श्रीमती मंजुलताजी, पवनजी, विनोदजी, सुभाषजी, अशोकजी, संजयजी, लोकेशजी एवं ईशानजी रावका परिवार को प्राप्त हुआ।
पार्श्वनाथ मंदिर के मंत्री संजय गंगवाल ने बताया कि उत्तम मार्दव धर्म मनुष्य को मान-अहंकार का त्याग कर विनम्रता, सरलता एवं मधुर व्यवहार अपनाने की प्रेरणा देता है। यह धर्म व्यक्ति को अपने ज्ञान, धन, शक्ति एवं सामाजिक प्रतिष्ठा का अभिमान छोड़कर सभी के प्रति सम्मान और सहजता का भाव रखने का संदेश देता है। सच्ची विनम्रता ही उत्तम मार्दव धर्म का सार है।
शाम को मंदिर परिसर में 1008 दीपकों से भव्य महाआरती हुई। दीपों की जगमगाती रोशनी और भक्तिमय वातावरण से मंदिर परिसर आध्यात्मिक उल्लास से सराबोर हो उठा। श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ महाआरती में भाग लेकर भगवान के चरणों में श्रद्धा अर्पित की।
मंदिर अध्यक्ष संजय रावका ने बताया कि दशलक्षण महापर्व के दौरान मंदिर में प्रतिदिन भगवान की पूजा-अर्चना एवं धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने समाज के श्रद्धालुओं से नियमित रूप से मंदिर पहुंचकर धर्म आराधना में भाग लेने का आह्वान किया।
दशलक्षण महापर्व के अवसर पर श्री दिगंबर जैन श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर (जयपुर) से पधारे विद्वान प्राचार्य एवं नगर गौरव श्री अरुण कुमार जैन ने विशेष प्रवचन दिए तथा श्रद्धालुओं को तत्वार्थ सूत्र का अध्ययन कराया। शाम को आरती के बाद उन्होंने उत्तम मार्दव धर्म पर सारगर्भित प्रवचन देते हुए कहा कि उत्तम मार्दव का अर्थ विनम्रता, कोमलता एवं अहंकार रहित जीवन जीना है। मनुष्य को अपने ज्ञान, धन, शक्ति अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा का अभिमान नहीं करना चाहिए, बल्कि सभी के साथ सौम्यता और सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि उत्तम मार्दव धर्म केवल बड़ों का सम्मान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटों के प्रति भी आदर और स्नेह का भाव रखना इसका महत्वपूर्ण अंग है। दूसरों की प्रशंसा सुनकर प्रसन्न होना तथा सभी के प्रति समान भाव रखना ही इस धर्म का सार है।
दशलक्षण महापर्व के दूसरे दिन शहर के विभिन्न जैन मंदिरों में पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी हुईं। समाज के महिला-पुरुषों ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर धर्म आराधना की। पूरे शहर में धार्मिक एवं भक्तिमय वातावरण बना रहा।
दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन शुक्रवार को उत्तम आर्जव धर्म की पूजा-अर्चना की जाएगी। दस दिवसीय महापर्व में प्रतिदिन एक धर्म की आराधना के माध्यम से श्रद्धालु आत्मशुद्धि, संयम, विनय एवं सदाचार का संदेश ग्रहण करेंगे।


