आगरा। शाबाश इंडिया।

जैनाचार्य निर्भय सागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में आगरा स्थित पारस धाम, छीपीटोला में मंगलवार को वैराग्य और संयम का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। राजस्थान के कोटा निवासी उद्योगपति मोहनलाल जैन ने सांसारिक जीवन का त्याग कर भगवती जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के उपरांत उन्हें मुनि वासुदत्त सागर जी महाराज नाम प्रदान किया गया। समारोह में हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में जयघोष के बीच यह ऐतिहासिक आयोजन संपन्न हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। मंच का उद्घाटन लोकोदय तीर्थ आगरा के अध्यक्ष निर्मल मोठया, स्वागताध्यक्ष प्रदीप पीएनसी, कार्याध्यक्ष हीरालाल बैनारा, उपाध्यक्ष राजेश जैन (गया वाले), महामंत्री नीरज जैन (सीटीवी), मध्यप्रदेश महासभा संयोजक विजय धुर्रा, सकल समाज अध्यक्ष जगदीश प्रसाद, मुख्य संयोजक मनोज वाकलीवाल, अनिल जैन फौजी, प्रवीण जैन नेता, सोनू जैन सहित अन्य अतिथियों ने किया।
मध्यप्रदेश महासभा संयोजक विजय धुर्रा ने कहा कि मोहनलाल जैन पिछले 16 वर्षों से गृहस्थ साधक के रूप में संयम और वैराग्य की साधना कर रहे थे। उन्होंने बताया कि मोहनलाल छह भाइयों में तीसरे स्थान पर हैं और लंबे समय पहले ही उन्होंने संयम मार्ग पर चलने का संकल्प ले लिया था। कठिन परीक्षाओं के बाद आज उन्हें आचार्य श्री के करकमलों से जैनेश्वरी दीक्षा प्राप्त हुई है।
समारोह का संचालन करते हुए मुख्य संयोजक मनोज वाकलीवाल ने कहा कि आगरा ने राग के अनेक प्रसंग देखे हैं, लेकिन आज वैराग्य का दुर्लभ और प्रेरणादायी प्रसंग देखने का अवसर मिला है। उन्होंने बताया कि आज एक ही मंच पर दो ऐतिहासिक आयोजन हुए, जिनमें मुनि शिवदत्त सागर जी महाराज को उपाध्याय पद पर सुशोभित किया गया तथा मोहनलाल जैन ने दीक्षा ग्रहण की।
प्रमुख उद्योगपति प्रदीप पीएनसी ने कहा कि वे अपनी उत्तराखंड यात्रा बीच में छोड़कर इस ऐतिहासिक वैराग्य महोत्सव के साक्षी बनने आगरा पहुंचे हैं। उन्होंने कहा कि घर-परिवार का त्याग करना अत्यंत साहस का कार्य है और मोहनलाल जैन ने यह कर दिखाया। वहीं नीरज जैन ने कहा कि जिनवाणी का संदेश जन-जन तक पहुंचाना हम सभी का दायित्व है और ऐसे आयोजन समाज को नई दिशा देते हैं।
अपने आशीर्वचन में आचार्य निर्भय सागर जी महाराज ने कहा कि दीक्षा का प्रथम आधार वैराग्य है। उन्होंने बताया कि मोहनलाल जैन लंबे समय से संयम की भावना को आत्मसात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मोक्ष का मार्ग कठिन है और इस पर शरीर नहीं, बल्कि आत्मबल के सहारे चला जाता है। दीक्षा के साथ ही साधु जीवन की परीक्षाएं प्रारंभ हो जाती हैं, जिनमें आत्मसंयम, त्याग और तपस्या सर्वोपरि हैं।
समारोह के दौरान मुनि शिवदत्त सागर जी महाराज को विधि-विधान के साथ उपाध्याय पद पर प्रतिष्ठित किया गया। वहीं दीक्षार्थी को नवीन पिच्छिका एवं कमंडलु भेंट करने का सौभाग्य केशव जैन परिवार (केशवाथाना), उमेश जैन, धर्मेंद्र जैन, मनोज कुमार जैन तथा अन्य परिजनों को प्राप्त हुआ।
इस अवसर पर आगरा सहित फिरोजाबाद, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी, मुरादाबाद, हिसार, गुरुग्राम, जयपुर, कोटा, अशोकनगर, सागर, झांसी, ललितपुर एवं अन्य स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। श्रद्धालुओं ने श्रीफल भेंट कर नवदीक्षित मुनिश्री का अभिनंदन किया, जबकि आयोजन समिति ने सभी अतिथियों का सम्मान किया।


