आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज की सल्लेखना साधना: त्याग, समता और आत्मबल की कालजयी गाथा
शाबाश इंडिया।

✒️ श्रीश ललितपुर की विशेष कलम से
इतिहास में असंख्य लोग जन्म लेते हैं और अनेक लोग प्रसिद्धि भी प्राप्त करते हैं, लेकिन काल के माथे पर अपना नाम वही अंकित करता है जिसकी साधना स्वयं समय को भी नमन करने के लिए विवश कर दे। आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज ने अपने जीवन की अंतिम साधना से यह सिद्ध कर दिया कि तप निष्कलंक हो, त्याग निर्मल हो और समता पूर्ण हो, तो मृत्यु भी पराजय का पर्याय बन जाती है।
आज सम्पूर्ण जैन समाज ही नहीं, बल्कि असंख्य श्रद्धालुओं के हृदय में जिन महापुरुष के प्रति अगाध श्रद्धा उमड़ रही है, उनके बारे में उत्तर भारत का एक बड़ा वर्ग कुछ समय पहले तक बहुत कम जानता था। मैं स्वयं भी उन्हीं लोगों में था। पहली बार जब यह समाचार मिला कि सांगली में आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज अपने करकमलों से मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित कर रहे हैं, तभी मन में जिज्ञासा जगी कि यह कौन-सा महापुरुष है, जो स्वयं सर्वोच्च पद पर होते हुए भी उसे सहज मुस्कान के साथ अपने शिष्य को समर्पित कर रहा है।
इसके बाद जो दृश्य संसार ने देखा, वह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि विनय, त्याग और गुरु-परंपरा का जीवंत उदाहरण था। नवप्रतिष्ठित आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज उच्चासन पर विराजमान थे और उनके समक्ष आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज पूर्ण विनय के साथ आचार्य संस्कार सम्पन्न करा रहे थे। शास्त्रों में वर्णित गुरु-परंपरा उस दिन साकार रूप में दिखाई दी। उसी क्षण यह स्पष्ट हो गया कि महानता केवल पद से नहीं, बल्कि त्याग और विनम्रता से प्राप्त होती है। उस एक दृश्य ने उन्हें जन-जन के हृदय में स्थापित कर दिया।
समय आगे बढ़ा। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज अपने संघ सहित कुण्ठलगिरि पहुँचे। वहीं आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज को ज्ञात हुआ कि इसी पावन भूमि पर आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज ने समता सहित समाधि धारण की थी। तब उनके अंतर्मन में भी यह दिव्य संकल्प जागृत हुआ कि जीवन का अंतिम अध्याय उसी भूमि पर लिखा जाए, जहाँ समता का स्वर्णिम इतिहास पहले से अंकित है।
इसके बाद साधना का वह अध्याय प्रारंभ हुआ, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ श्रद्धा और प्रेरणा के साथ स्मरण करेंगी। उन्होंने क्रमशः अन्न और फिर जल का त्याग किया। शरीर निरंतर क्षीण होता गया, लेकिन आत्मबल और अधिक प्रखर होता गया। तेरह दिनों तक यम-सल्लेखना की प्रत्येक मर्यादा का अक्षरशः पालन करते हुए उन्होंने समता, सजगता और आत्मजागरण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। अंततः रात्रि 11:34 बजे वह क्षण आया, जब शरीर यहीं रह गया और साधक अपनी साधना की विजयगाथा लिखते हुए अनंत यात्रा पर अग्रसर हो गया।
यह केवल एक समाधि नहीं थी, बल्कि संसार के लिए यह उद्घोष था कि साधना आज भी जीवित है, शास्त्र आज भी प्रासंगिक हैं और समता आज भी संभव है।
कुण्ठलगिरि पहले से ही आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की समाधि के कारण पावन तीर्थ था, किंतु आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज की उत्कृष्ट सल्लेखना साधना ने इस क्षेत्र को नई आध्यात्मिक चेतना, नई पहचान और नई ऊर्जा प्रदान की। इसका महत्वपूर्ण श्रेय आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के अद्भुत निर्यापकत्व को भी जाता है। उन्होंने साधक की साधना और श्रद्धालुओं की भावनाओं के बीच ऐसा संतुलन स्थापित किया कि हजारों श्रद्धालु दर्शन का लाभ भी प्राप्त कर सके और साधना की मर्यादा भी अक्षुण्ण बनी रही। यह केवल व्यवस्था नहीं, बल्कि करुणा, विवेक और आध्यात्मिक नेतृत्व का उत्कृष्ट उदाहरण था।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि आने वाला समय कुण्ठलगिरि के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय सिद्ध होगा। जहाँ किसी महापुरुष की अंतिम साधना सम्पन्न होती है, वहाँ केवल स्मारक नहीं बनते, बल्कि चेतना का वास होता है। वहाँ केवल पत्थर नहीं रहते, बल्कि तप की तरंगें प्रवाहित होती हैं। वहाँ केवल हवा नहीं बहती, बल्कि साधना की दिव्य अनुभूतियाँ वातावरण में व्याप्त रहती हैं। जो भी श्रद्धा के साथ उस पावन भूमि पर पहुँचेगा, उसका मन स्वतः ही अधिक निर्मल, अधिक शांत और अधिक अंतर्मुखी होगा।
मैं बार-बार आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के श्रीचरणों में नमन करता हूँ। वीर प्रभु से यही प्रार्थना है कि जीवन में साधना चाहे जितनी छोटी हो, उपलब्धियाँ चाहे जितनी सीमित हों, लेकिन अंतिम समय में ऐसा ही निर्मल भाव, ऐसी ही सजगता और ऐसी ही समता प्राप्त हो। यदि महान साधक बनना मेरे भाग्य में न भी हो, तो कम से कम अंत ऐसा हो कि मृत्यु भय का नहीं, बल्कि समाधि के उत्सव का प्रतीक बन जाए।
आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज ने केवल जीना ही नहीं सिखाया, बल्कि यह भी सिखाया कि जीवन का अंतिम क्षण भी साधना की सर्वोच्च उपलब्धि बन सकता है। जो मृत्यु को साध लेता है, वही वास्तव में जीवन को जीत लेता है।
कोटि-कोटि नमन… बारंबार नमन… अनंत नमन… उस कालजयी साधक को, जिसने मृत्यु को महोत्सव और समाधि को अमर इतिहास बना दिया।


