असीम कालीन भक्तावर विधान का शुभारंभ
कैदियों के उद्धार के लिए तीन किलोमीटर पैदल चलकर पहुंचे गुरुदेव: जेलर दीक्षित
अशोक नगर।
जीवन हमें खुशियों के इज़हार के लिए मिला है और इस सम्मान के हम सभी अधिकारी हैं। हनुमानजी हमें यह मार्ग दिखाते हैं कि जीवन में सम्मान कैसे प्राप्त किया जाता है। भगवान भक्तों के माध्यम से ही समाज में दिखाई देते हैं। केवल जयकार करना भक्ति नहीं है, बल्कि ऐसा जीवन जीना ही सच्ची भक्ति है कि लोग भक्त को देखकर भगवान के स्वरूप की कल्पना करें।
उक्त विचार राष्ट्रसंत निर्यापक श्रमण मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज ने जिला जेल में बंद बंदियों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वे अपराधियों के बीच नहीं, बल्कि अपने भाइयों के बीच आए हैं। हम सबकी माता भारत माता है, फिर हमारे बीच यह भेद क्यों?
उन्होंने कहा कि जेल देशद्रोहियों के लिए बनाई गई थी, उन लोगों के लिए जो मातृभूमि को अपना नहीं मानते और जिन्हें “वंदे मातरम्” कहने में भी संकोच होता है। आज आवश्यकता है कि हम अपने भीतर झांकें और स्वयं को सुधारें।
इस अवसर पर जैन समाज के मंत्री विजय धुर्रा ने कहा कि जेल अधीक्षक दीक्षित ने कई बार चातुर्मास के दौरान पूज्य राष्ट्रसंत मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज के चरणों में निवेदन किया था कि जेल में बंद कैदियों को भी आपके मंगल प्रवचनों का लाभ मिलना चाहिए। पूज्य गुरुदेव ने कृपा कर आज बंदियों को आशीर्वाद प्रदान किया।
जेल अधीक्षक दीक्षित ने कहा कि उन्हें पूर्व में परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के सान्निध्य में डिंडोरी जिला जेल में मंगल प्रवचनों का लाभ प्राप्त हुआ था। आज राष्ट्रसंत मुनि सुधासागरजी महाराज कई किलोमीटर पैदल चलकर कैदियों के उद्धार के लिए पहुंचे हैं। ऐसे संतों को देखकर मन श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता है।
मुनिश्री ने कहा कि अपने खून-पसीने की कमाई को नशे और शराब में नष्ट करने से जीवन में कभी खुशहाली नहीं आ सकती। जेल दंड देने के लिए नहीं, बल्कि सुधार का अवसर देने के लिए होती है। ईश्वर ने हमें इस धरती पर सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए भेजा है। अहंकार, नशा और अपराध से दूर रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति महान है, जहां नारायण श्रीकृष्ण भी शांति के लिए दूत बनते हैं और श्रीराम अपने अधिकार होते हुए भी माता की आज्ञा का पालन करते हैं। आज अधिकांश अपराध अहंकार, परिस्थितियों और आदतों के कारण होते हैं। यदि व्यक्ति आत्मचिंतन कर ले, तो उसका जीवन सुधर सकता है।
मुनिश्री ने बंदियों से आह्वान किया कि वे अपनी सजा को प्रायश्चित मानें, आदर्श कैदी बनें और ईमानदारी से अपने जीवन को सुधारें। यदि ऐसा संकल्प लिया जाए, तो ईश्वर की कृपा से सजा में भी राहत संभव है। उन्होंने कहा कि मैं भगवान का संदेश लेकर आया हूं—थोड़ा सा पश्चाताप ही जीवन को नई दिशा दे सकता है।
इस अवसर पर अध्यक्ष राकेश कांसल, उपाध्यक्ष अजित वरोदिया, महामंत्री राकेश अमरोद, कोषाध्यक्ष सुनील अखाई, मंत्री शैलेन्द्र श्रागर, मंत्री विजय धुर्रा, मंत्री संजीव भारिल्ला, मीडिया प्रभारी अरविंद कचनार, ऑडिटर संजय के.टी., संयोजक मनोज रन्नौद, उमेश सिंघई, मनीष सिंघई, श्रेयांस जैन सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।


